मशीनों के लिए क्या मेसी को भूल जाएंगे

Contributed byअतनु विश्वास|नवभारतटाइम्स.कॉम
will machines forget human sportsmanship an analysis of robot speed
पेइचिंग में वर्ल्ड ह्यूमनॉइड रोबॉट गेम्स के दौरान तकनीक ने एक बार फिर भविष्य की झलक दिखाई। चीन के ‘लाइटनिंग’ ने एक टेस्ट में 100 मीटर की दौड़ 9.32 सेकंड में पूरी की। इसने दुनिया के सबसे तेज धावक उसेन बोल्ट के 2009 के 9.58 सेकंड के वर्ल्ड रेकॉर्ड को तोड़ दिया। आधिकारिक मुकाबले में ‘तियानगोंग अल्ट्रा’ ने 9.39 सेकंड और लाइटनिंग ने 9.47 सेकंड में दौड़ पूरी कर ली।

खिलाड़ी ही करेंगे रोमांचित
आंकड़े भले हैरान करने वाले हैं, लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या यह फिजिकल स्पोर्ट्स के लिए ‘डीप ब्लू मोमेंट’ है? 1997 में IBM के सुपरकंप्यूटर ने वर्ल्ड चेस चैंपियन गैरी कास्पारोव को हराया, तो उसे डीप ब्लू मोमेंट कहा गया था। आज मशीनें सबसे मजबूत चेस इंजन बनकर इंसानों से आगे निकल गई हैं। लेकिन, आज भी हम मैग्नस कार्लसन और आर. प्रग्नानंदा का खेल देखते हैं। उनकी तैयारी, घबराहट, सूझबूझ, गलतियां और हिम्मत हमें अब भी रोमांचित करती हैं।

डीप ब्लू ने शतरंज का मुकाबला जीता था, लोगों की कल्पनाएं नहीं। फिजिकल स्पोर्ट्स के साथ भी यही हो सकता है। 2002 के नोबेल पुरस्कार विजेता डेनियल कुनेमैन ने कहा था कि टेक्नॉलजी की रफ्तार तेज हो सकती है और इंसान धीरे-धीरे आगे बढ़ता है। लाइटनिंग और तियानगोंग से हमने इस बात को सच होते देखा। इंसानों ने 100 मीटर की दौड़ में नैनो सेकंड का फर्क सुधारने में दशकों लगा दिए। ऐसा लगता था कि बोल्ट का रेकॉर्ड कभी नहीं टूटेगा। मगर, मशीनों ने भ्रम तोड़ दिया। इसका कारण है कि मशीनों को विकास का इंतजार नहीं करना पड़ता। उन्हें कभी भी हालात के मुताबिक ढाला जा सकता है।

तियानगोंग अल्ट्रा की तरक्की टेक्नॉलजी में बदलावों को दर्शाती है। पिछले साल इसी प्रतियोगिता में उसे 21.50 सेकंड लगे थे। यह सिर्फ नया रेकॉर्ड नहीं, बल्कि तकनीकी सुधार की झलक है। लाइटनिंग ने अप्रैल में पेइचिंग हाफ मैराथन 50 मिनट 26 सेकंड में पूरी की थी। इसके बाद इंजीनियरों ने उसके पैरों में बदलाव किए। बरसों की ट्रेनिंग के बाद हम अपने शरीर को बेहतर बनाते हैं, लेकिन रोबॉट के साथ ऐसा नहीं होता। संभव है कि भविष्य में रोबॉट मेसी, कोहली या जोकोविच से बेहतर प्रदर्शन करें, तो क्या तब हम अपने पसंदीदा खिलाड़ियों को देखना बंद कर देंगे?

मेरे ख्याल से ऐसा कभी नहीं होगा, क्योंकि हम किसी खेल को सिर्फ तेज खिलाड़ी या मजबूत बाजुओं के लिए नहीं देखते। उसमें अपनी कहानी देखते हैं। बोल्ट ने जब 9.58 सेकंड में दौड़ पूरी की थी, तो हम सिर्फ किसी शख्स को 100 मीटर दौड़ते नहीं देख रहे थे। उन कुछ सेकंड में बचपन के सपने, बरसों की ट्रेनिंग, थकान, चोट, अनुशासन और डर शामिल थे। खिलाड़ियों को अपनी सीमा पता है। दर्शक भी बखूबी समझते हैं।

नहीं बदलेगा जज्बा

खेल सिर्फ बेहतर प्रदर्शन का नाम नहीं, अपनी सीमा के भीतर किए गए प्रदर्शन का नाम है। भले ही भविष्य में मशीनें शानदार प्रदर्शन करें, लेकिन वे उसके मायने नहीं समझ पाएंगी। एथलेटिक्स, फुटबॉल और क्रिकेट में मशीनों की सीमा पता चलेगी, लेकिन जब इंसान खेलेंगे तो पता चलेगा कि हम कितनी दूर जा सकते हैं। टेक्नॉलजी हमारी काबिलियत से आगे निकल सकती है, लेकिन हमारा जज्बा और मकसद नहीं बदल सकता।

टेक्नॉलजी के बदलाव के बारे में कुनेमैन ने सही कहा था। संभव है कि मशीनें उन कामों में हमसे बहुत आगे निकल जाएं, जो कभी लगता था कि हम ही कर सकते हैं। लेकिन, इससे फिजिकल स्पोर्ट्स और दिलचस्प हो जाएंगे। जब मशीनें हमसे बेहतर प्रदर्शन करने लगेंगी, तब अपनी कमियों के बावजूद जी तोड़ मेहनत करता इंसान खास लगेगा। हम खेल सिर्फ इसलिए नहीं देखते कि क्या होगा। हम यह देखना चाहते हैं कि हमारे जैसा इंसान क्या कर सकता है। भले ही आने वाला समय प्रदर्शन के लिहाज से मशीनों का होगा, लेकिन रोमांचित तो इंसान ही करेंगे।

(लेखक इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट, कोलकाता में प्रफेसर हैं)