ख़ुद से पढ़ना भूले, बदहाली की यह भी वजह

नवभारतटाइम्स.कॉम•
students forget self study root of coaching culture and moral decline
भारत में शिक्षा केवल परीक्षा पास करने का माध्यम नहीं रही, अपितु व्यक्तित्व निर्माण, आत्मबोध और चरित्र विकास का आधार मानी गई है। हमारी प्राचीन परंपरा में विद्यार्थी को ज्ञान का सक्रिय साधक माना गया और ज्ञानार्जन के अनेक स्रोतों का वर्णन किया गया है,

'आचार्यात् पादमादत्ते पादं शिष्यः स्वमेधया ।
पादं सब्रह्मचारिभ्यः पादं कालक्रमेण च॥'

इसका अर्थ है कि विद्यार्थी ज्ञान का एक भाग आचार्य से प्राप्त करता है, दूसरा भाग अपनी बुद्धि, जिज्ञासा और स्वाध्याय से, तीसरा अपने सहपाठियों से और चौथा समय व अनुभव के माध्यम से अर्जित करता है। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि शिक्षा का वास्तविक आधार शिक्षक के साथ-साथ विद्यार्थी का स्वयं का अध्ययन, चिंतन और आत्मप्रयास भी है। दुर्भाग्यवश आज की शिक्षा व्यवस्था में यही स्वाध्याय सबसे अधिक संकटग्रस्त दिखाई दे रहा है।

कोचिंग कल्चर का बुरा असर

आज विद्यार्थी का अधिकांश समय विद्यालय, कोचिंग और ट्यूशन में व्यतीत होता है। उसके पास न तो आत्मचिंतन का समय बचता है और न ही विषय को स्वयं समझने का अवसर। शिक्षा अब ज्ञान अर्जन की प्रक्रिया न होकर ‘रेडीमेड उत्तर’ प्राप्त करने की दौड़ बनती जा रही है। यही कारण है कि विद्यार्थियों में आत्मविश्वास और मौलिकता का ह्रास हो रहा है। कुछ दशक पहले तक देश में ट्यूशन और कोचिंग संस्कृति का इतना व्यापक प्रचलन नहीं था। तब भी विद्यार्थी सफल होते थे, प्रतियोगिताओं में आगे बढ़ते थे और समाज को नई दिशा देने वाले महापुरुष बनते थे। आज के विद्यार्थियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वे पढ़ तो बहुत रहे हैं, पर सीख कम रहे।

अभिभावकों की व्यस्तता और विद्यालयों की कमजोर होती शैक्षणिक व्यवस्था ने कोचिंग संस्कृति को बढ़ावा दिया है। अनेक अभिभावकों के पास बच्चों के साथ बैठने, उनकी जिज्ञासाओं को सुनने और अध्ययन में मार्गदर्शन देने का समय नहीं है। दूसरी ओर विद्यालय स्तर पर शिक्षण की गुणवत्ता को लेकर प्रश्न खड़े होते रहे हैं। परिणामस्वरूप अभिभावक यह मानने लगे हैं कि बिना ट्यूशन और कोचिंग के बच्चे सफल नहीं हो सकते। यही सोच धीरे-धीरे विद्यार्थियों के मन में भी घर कर गई है।

सामाजिक और नैतिक संकटसंकट

कोचिंग संस्कृति से शिक्षा में शॉर्टकट की प्रवृत्ति बढ़ी है। विद्यार्थियों का लक्ष्य विषय को समझना नहीं, किसी भी प्रकार परीक्षा में अधिक अंक प्राप्त करना बन गया है। हाल ही में हुई नीट पेपर लीक की घटना भी इसी विकृत सोच से जुड़ी दिखाई देती है। पेपर लीक की घटना केवल प्रशासनिक या कानूनी विफलता का विषय नहीं, यह एक गहरे सामाजिक और नैतिक संकट का संकेत भी है।

समस्या केवल शिक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं है। आज समाज के अनेक क्षेत्रों में नैतिक मूल्यों का क्षरण दिखाई देता है। जब परिवारों में संस्कार, ईमानदारी और नैतिक मूल्यों का संवर्धन कमजोर पड़ता है, तब कानून का भय भी पर्याप्त नहीं रह जाता। इसलिए राष्ट्र निर्माण केवल कानूनों और सरकारों से नहीं, चरित्र निर्माण से होता है। और चरित्र निर्माण का सबसे मजबूत आधार परिवार, शिक्षा और संस्कार ही हैं।

शिक्षा का असली उद्देश्य

माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के साथ समय बिताएं, उनके भीतर पढ़ने की आदत विकसित करें। घर का वातावरण संवाद, अध्ययन और संस्कारों से युक्त होना चाहिए। बच्चों के साथ भोजन करना, चर्चा करना, पुस्तक पढ़ने के लिए प्रेरित करना और उनके मानसिक दबाव को समझना भी शिक्षा का ही हिस्सा है। विद्यालयों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाले कर्मचारी न बनें। वे विद्यार्थियों में जिज्ञासा, अन्वेषण, आत्मविश्वास और नैतिक मूल्यों का विकास करें। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, चरित्रवान, आत्मनिर्भर और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना भी है। जब तक शिक्षा व्यवस्था में यह दृष्टि फिर से स्थापित नहीं होगी, तब तक कोचिंग संस्कृति का बढ़ता प्रभाव समाज को भीतर से कमजोर करता रहेगा। भारत को पुनः ज्ञान-आधारित समाज बनाना है तो स्वाध्याय की परंपरा को पुनर्जीवित करना होगा।

(लेखक NCERT के निदेशक हैं)