नया निवेश होने पर बढ़ेंगे रोज़गार के मौक़े

Contributed byअनंत स्वरूप|नवभारतटाइम्स.कॉम
new investment will increase employment opportunities ficci
दूसरे देशों से व्यापार समझौतों में भारत का रुख पहले से काफी अलग हो गया है। यह कहना है उद्योग संगठन FICCI के सेक्रेटरी जनरल अनंत स्वरूप का। अखिलेश प्रताप सिंह को दिए इंटरव्यू में उन्होंने ब्रिटेन और यूरोपियन यूनियन से फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स के फायदों के अलावा देश में निजी निवेश में सुस्ती और रोजगार से जुड़ी चुनौतियों पर बात की। पेश हैं मुख्य अंश:

n पहले भी FTA हुए थे, अब भी हो रहे हैं। क्या अंतर आया है?
तीन चरण हैं इसके। आजादी के तुरंत बाद इस पर ज्यादा जोर नहीं था। हालांकि 1950 में ही हमने नेपाल के साथ फ्रेंडशिप ट्रीटी कर ली थी। फिर SAARC के साथ की। दूसरे चरण में, उदारीकरण के दौर में जब 1991 में अर्थव्यवस्था खुलने लगी, तब इंडोनेशिया, मलयेशिया सहित ASEAN देशों के अलावा जापान और कोरिया से FTA हुए। चिली, पेरू और मर्क्यूसर देशों के साथ भी कुछ सीमित लाइनों पर समझौते हुए। फिर 2014 के बाद इनकी समीक्षा के साथ तीसरा चरण शुरू हुआ। आसियान, जापान और कोरिया से समझौतों के बाद हमारा निर्यात उस अनुपात में नहीं बढ़ा, जिस तरह आयात बढ़ा। अब प्रतिस्पर्द्धी अर्थव्यवस्थाओं के बजाय ऐसे देशों से FTA पर जोर है, जो हमारे लिए कॉम्प्लिमेंटिंग इकॉनमी हैं। जैसे यूरोपियन यूनियन, ब्रिटेन।

n आसियान, कोरिया से समझौतों में फायदा क्यों नहीं हुआ?

ASEAN देश मुख्य रूप से हमारे जैसे ही सामान बनाते हैं और उन्हीं देशों में बेचते हैं, जहां हम भेजते हैं। लागत कम रखने में भी ये हमसे बेहतर रहे, जिससे उनका माल हमारे यहां ज्यादा बिकने लगा। जापान और कोरिया के गुणवत्ता मानक काफी ऊंचे थे। जापान FTA से बड़ा फायदा यह हुआ कि दोनों देशों में सहयोग बढ़ा। भारत में करीब 40 बिलियन डॉलर का निवेश आया। कोरिया से करीब 8 बिलियन डॉलर निवेश आया।

n ब्रिटेन और EU से ट्रेड डील से किस तरह लाभ होगा?

हमारे अधिकांश निर्यात पर इन देशों में टैरिफ या तो जीरो हो जाएगा या बहुत कम रह जाएगा। दूसरे देशों से मुकाबले में हमारी पोजिशन भी बेहतर होगी। जैसे, बांग्लादेश का उदाहरण देखिए। बांग्लादेश लीस्ट डिवेलप्ड कंट्री कैटिगरी में है। वैश्विक व्यवस्था के तहत उसे कई विकसित बाजारों में ड्यूटी फ्री और कोटा फ्री एक्सेस मिलता है। बांग्लादेश उन बाजारों में अगर जीरो ड्यूटी पर कपड़ा भेज रहा था, तो हमारे एक्सपोर्ट पर 11-12% ड्यूटी थी। अब ब्रिटेन या EU से FTA में भारत को जीरो ड्यूटी एक्सेस मिलेगा। ब्रिटेन और EU से समझौतों में भारत ने एग्री और डेयरी जैसे सेक्टरों को सुरक्षित रखा है। हमारे टेक्सटाइल, गारमेंट, लेदर, फुटवियर, मरीन प्रोडक्ट्स और फार्मास्युटिकल्स जैसे ज्यादा रोजगार देने वाले सेक्टरों को लाभ होगा।

n सरकार कह रही कि इंडस्ट्री FTA से लाभ लेने को जोर लगाए। क्या करना है इंडस्ट्री को?

टैरिफ के अलावा एक पहलू नॉन-टैरिफ बैरियर्स यानी गुणवत्ता के मानकों का भी है। अगर ब्रिटेन या EU में माल बेचना है तो हमें उनके स्टैंडर्ड्स का पालन करना होगा। FTA से टैरिफ की बाधा हटेगी, लेकिन क्वॉलिटी के मोर्चे पर काम करना होगा, तभी समझौतों का पूरा लाभ मिलेगा।

n प्राइवेट सेक्टर से निवेश उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ रहा?

ऐसा नहीं है कि किसी भी सेक्टर में निवेश नहीं हो रहा। कुछ सेक्टरों में अच्छा निवेश हो रहा है। हालांकि ओवरऑल कोई भी इंडस्ट्री निवेश करने से पहले देखती है कि प्रॉजेक्ट से रिटर्न कितना मिलेगा, बाजार में डिमांड कितनी है, इनवेस्टमेंट क्लाइमेट कैसा है, किसी सेक्टर में विदेश से सस्ता माल तो नहीं आ रहा। इस मामले में एक बड़ा कारण टैरिफ का कम होना और चीन जैसे देशों से होने वाली डंपिंग भी है।

n FICCI के हालिया सर्वे में कहा गया कि पहले से कम कंपनियां हायरिंग की योजना बना रही हैं। ऐसा क्यों?

AI और ऑटोमेशन से उद्योगों की एफिशिएंसी बढ़ी है और मानव श्रम की जरूरत घटी है। लागत घटाने के लिए कंपनियां ऐसा कर रही हैं। वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता और अमेरिकी नीतियों में लगातार बदलाव के चलते भी इंडस्ट्री वेट एंड वॉच मोड में है। जब तक नया निवेश नहीं होगा, नई जॉब्स नहीं बनेंगी।

n इंडस्ट्री क्या चाहती है?

इंडस्ट्री चाहती है कि सरकार ज्यादा इंसेंटिव दे। केंद्र में एक ही सरकार लंबे समय से होने से नीतियों में निरंतरता के मामले में फायदा हुआ है। लेकिन राज्यों के स्तर पर ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में दिक्कतें हैं। इंडस्ट्री और सरकार में तालमेल बेहतर करना होगा। राज्यों के स्तर पर भी ऐसा हो जाए, तो अर्थव्यवस्था के लिए आने वाला समय शानदार रहने वाला है।