डिजिटल सुरक्षा की नीतियां बनें

नवभारतटाइम्स.कॉम
why strict policies on childrens digital safety are necessary learning from australia britain
ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन जैसे कई देशों में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं। बच्चों को हिंसक, झूठे और भ्रामक कंटेंट से बचाने के लिए ये कदम उठाए गए हैं। ऐसा कंटेंट उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। दरअसल, तमाम चिंताओं के बावजूद बच्चों का स्क्रीन टाइम बढ़ता जा रहा है। बाजार भी उन्हें टारगेट करते हुए लुभावना कंटेंट पेश कर रहा है। डिजिटल इकॉनमी में बच्चे अब केवल उपभोक्ता नहीं रह गए हैं बल्कि उनकी पसंद-नापसंद और व्यवहार संबंधी आंकड़ों का इस्तेमाल मुनाफा कमाने के लिए किया जाता है। कंपनियों का मुनाफा बच्चों को अधिक से अधिक समय तक ऑनलाइन बनाए रखने से बढ़ता है।

इंटरनेट की मजबूत पकड़ । ASER 2024 की रिपोर्ट बताती है कि 14 से 16 वर्ष की उम्र के 89% किशोरों के घर में स्मार्टफोन है। इनमें से 76% सोशल मीडिया के लिए स्मार्टफोन का उपयोग करते हैं। कल्पना कीजिए कि एक बच्चा सुबह उठते ही मोबाइल फोन उठा ले। नाश्ते की मेज तक पहुंचने से पहले ही कई डिजिटल प्लैटफॉर्म्स के अल्गोरिदम उसका ध्यान अपनी ओर खींचने की होड़ में लग जाएं। बच्चे का हर स्क्रॉल, हर स्वाइप और हर सर्च रेकॉर्ड हो। फिर उसका विश्लेषण कर उसे आर्थिक मूल्य में बदल दिया जाए। हैरानी की बात है कि यह पूरी प्रक्रिया महज 50 से 100 मिलीसेकंड में पूरी हो रही है।
डेटा की बिक्री । ज्यादातर डिजिटल प्लैटफॉर्म या तो मुफ्त हैं या उनकी सदस्यता फीस बहुत कम है, क्योंकि उनका असली उत्पाद स्वयं उपयोगकर्ता होता है। इन्हें इस तरह डिजाइन किया जाता है कि बच्चे अधिक से अधिक समय तक इनसे जुड़े रहें। बच्चों के व्यवहार से जुड़ा डेटा बाजार में ऊंचे दामों पर बिकते हैं। आज के दौर में आपका ध्यान ही सबसे मूल्यवान करंसी है। बच्चों का ध्यान और भी कीमती है, क्योंकि उसी से भविष्य के उपभोक्ताओं को आकार दिया जा सकता है। अर्थशास्त्री और समाज वैज्ञानिक हर्बर्ट साइमन ने कहा था कि जानकारी की अधिकता, ध्यान की कमी पैदा करती है। AI और चैटबॉट्स के युग में बच्चों के लिए सही और उपयोगी जानकारी चुनना अब भी चुनौती बना हुआ है।

बच्चे नहीं वयस्क उपभोक्ता । विभिन्न ऐप्स द्वारा अनंत स्क्रॉलिंग, ऑटो-प्ले और उपयोगकर्ता को तरह-तरह के डिजिटल पुरस्कार देने जैसी सुविधाएं कोई संयोग नहीं हैं। इन्हें इस तरह बनाया गया है कि उपयोगकर्ता लगातार स्क्रीन पर बना रहे। वहीं, बच्चों की निर्णय लेने और आवेगों को नियंत्रित करने की क्षमता अभी विकसित हो रही है, इसलिए वे ऐसे डिजिटल प्रलोभनों के प्रति आसानी से प्रभावित हो जाते हैं। उन पर इनका दुष्प्रभाव पड़ता है। सामाजिक मनोवैज्ञानिक जोनाथन हैड्ट का कहना है कि बचपन अब ‘खेल आधारित’ होने के बजाय ‘फोन आधारित’ होता जा रहा है।

स्मार्टफोन और सोशल मीडिया बच्चों के सामाजिक, भावनात्मक और मानसिक विकास को गहराई से प्रभावित कर रहे हैं। यूनिसेफ इंडिया की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, डिजिटल तकनीक ने शिक्षा और भागीदारी के नए अवसर तो दिए हैं, लेकिन निजता के लिए खतरा, व्यावसायिक शोषण और ऑनलाइन नुकसान की ओर धकेला भी है। इसलिए, बच्चों को केंद्र में रखकर डिजिटल गवर्नेंस की आवश्यकता है। डिजिटल युग में बचपन की रक्षा केवल डिजिटल साक्षरता से नहीं होगी। इसके लिए यह समझना होगा कि ध्यान केवल व्यापारिक संसाधन नहीं है, बल्कि बच्चों के विकास की एक बुनियादी जरूरत भी है।

किसकी जिम्मेदारी । क्या डिजिटल दुनिया को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी केवल माता-पिता की है? या सरकार और तकनीकी कंपनियों की भी जिम्मेदारी बनती है? दुनिया के कई देशों में नीति-निर्माता अब इस समस्या को गंभीरता से ले रहे हैं। ब्रिटेन की आयु-उपयुक्त डिजाइन संहिता और यूरोपीय संघ का डिजिटल सेवा अधिनियम मानते हैं कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल माता-पिता की नहीं, बल्कि डिजिटल प्लैटफॉर्मों की भी है।

असल सवाल यह है कि क्या ऐसे आर्थिक मॉडल पर सीमाएं लगाने की तैयारी है भारत जैसे देश में, जहां सस्ते स्मार्टफोन और सस्ते इंटरनेट ने बच्चों की डिजिटल दुनिया में पहुंच को बहुत बढ़ा दिया है। चुनौती यह नहीं है कि बच्चे ऑनलाइन हों या नहीं, बल्कि यह है कि डिजिटल पहुंच के साथ-साथ उनकी डिजिटल सुरक्षा भी सुनिश्चित की जाए। दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे युवा ऑनलाइन आबादियों में से एक होने के कारण भारत के पास यह अवसर है कि वह ऐसा डिजिटल शासन मॉडल विकसित करे जिसमें तकनीकी इनोनेशन जितना महत्वपूर्ण हो, बच्चों के अधिकार और सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो।

(लेखिका क्राइस्ट यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रफेसर हैं)