मनुष्य के भीतर चेतना और बंधन दोनों मौजूद होते हैं। मन, इच्छाएं, बाहरी आकर्षण उसे जकड़े रखते हैं। आध्यात्मिक ऊंचाई पाने के लिए इन बंधनों को ढीला करना आवश्यक है। जैसे एक कांटे को दूसरे कांटे से निकाला जाता है, वैसे ही मन के बंधनों को भी मन की शक्ति और साधना के माध्यम से हटाना पड़ता है।
चेतना मनुष्य को भीतर से प्रेरित करती है। जब मन सात्विक और संवेदनशील होता है, तब वह सत्य का अनुभव करता है। तब उसमें सीमित अस्तित्व को विराट चेतना में विलीन करने की आकांक्षा जागती है। मन की यही सूक्ष्म और तीक्ष्ण अवस्था अग्रयाबुद्धि कहलाती है। इसी के विकास से लोगों की दृष्टि तय होती है। कुछ लोग बाहरी संसार तक सीमित रहते हैं, जबकि कुछ लोग गहरे सत्य को समझने लगते हैं। जो इंद्रियों और आकर्षणों को नियंत्रित नहीं कर पाते, वे बाहरी वस्तुओं, भौतिक सुखों में उलझे रहते हैं। ऐसे व्यक्ति चेतना के परम आनंद से वंचित रहकर सुख-दुख में फंसे रहते हैं।
इसी कारण ज्ञानी कहते हैं कि मन को भीतर की ओर मोड़ना चाहिए। जब मन वास्तविक स्वरूप में स्थिर होता है, तब ही सर्वोच्च शांति और आत्मानुभूति पाता है। उपनिषद में लिखा है- ‘इंद्रियों की प्रवृत्ति बाहर की ओर भागने की है, इसलिए मनुष्य बाहरी वस्तुओं को देखता है, अपने भीतर की आत्मा को नहीं। किन्तु कोई विरला धीर पुरुष ही अमरत्व की इच्छा से दृष्टि को भीतर मोड़कर आत्मा का दर्शन करता है।’
मनुष्य की इंद्रियां स्वभावगत बाहरी वस्तुओं की ओर दौड़ती हैं। हर जीव अपने अस्तित्व को बनाए रखना चाहता है, क्योंकि वह जीवन में सुख चाहता है। उसे लगता है, जीवन समाप्त होने पर सुख की संभावना भी समाप्त हो जाएगी। इसीलिए वह मृत्यु से डरता है। पर दुख आने पर वह थकने लगता है। असल में, मनुष्य सुख में बाधक चीजों को नष्ट करना चाहता है। जब मनुष्य अपने मन को साधकर चेतना की ओर बढ़ता है, तभी वह स्थायी शांति, आनंद और आत्मिक स्वतंत्रता का अनुभव कर पाता है।
(प्रस्तुति: दिव्यचेतनानंद अवधूत)



