nNBT न्यूज, लखनऊ
‘मैं हूं अब्बास, मुझे शेर-ए-अली कहते हैं, सब शुजाआने अरब मुझको जरी कहते हैं।
मुझको जो जानते हैं, हक़ का वली कहते हैं, अर्श वाले मुझे क़िस्मत का धनी कहते हैं।
वजह शाही की मेरी ख़िदमते सिब्तैन बनी, ताज मेरे लिए शब्बीर की नालैन बनी।’
इमाम हुसैन को छोटे भाई हजरत अब्बास की शान में लिखे गए इस मर्सिये को मोहर्रम की चार तारीख को विक्टोरिया स्ट्रीट स्थित इमामबाड़ा नाज़िम साहब में मर्सियाख़्वान औन रिज़वी ने पेश किया। इदारा-ए-तहफ़्फ़ुज़-ए-मर्सियाख़्वानी की ओर से इस मजलिस में बड़ी संख्या में अज़ादार मौजूद रहे। शनिवार को मजलिसों में इमाम हुसैन के साथी हबीब इब्ने मज़ाहिर, जनाबे हुर्र और उनके बेटों की शहादत का ज़िक्र किया गया। उलेमा ने बताया कि जनाबे हुर्र शुरुआत में यज़ीद की फ़ौज की एक टुकड़ी के सेनापति थे, लेकिन 10वीं मोहर्रम की अल सुबह कर्बला में हक़ और बातिल के बीच फ़ैसले की घड़ी आने पर उन्होंने अपने बेटों के साथ यज़ीद का लश्कर छोड़ दिया और इमाम हुसैन के छोटे से काफिले में शामिल हो गए। बाद में इन्होंने इमाम के लिए लड़ते हुए शहादत हासिल की।
विक्टोरिया स्ट्रीट स्थित नाजमिया मदरसा में आयतुल्लाह हमीदुल हसन ने मजलिस में पढ़ा कि, कुछ लोग कर्बला के शहीदों पर रोने को ऐतराज करते हैं। अक्सर आपने देखा होगा कि किसी के जनाजे में दो तरह के लोग होते हैं। एक वह जो रो रहे होते हैं और दूसरे वह जो सिर झुकाए होते हैं। इससे अंदाजा लगता है कि जो रो रहे हैं, उनका मरने वाले से दिली ताल्लुक है। जो सिर झुकाए हैं, वे रस्में दुनिया की वजह से आए हैं। यही वजह है कि इमाम हुसैन और उनके परिवारीजन हमारे दिलों में बसे हैं, लिहाजा उनकी शहादत सुनकर आंखों से आंसू छलक आते हैं। शहर के विभिन्न इमामबाड़ों और अजाख़ानों में दिनभर मजलिसें और मातम होता रहा। अज़ादारों ने शहीदाने कर्बला को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश किया और ग़म-ए-हुसैन में डूबे रहे।

