बच्चों को सिर्फ सुविधाएं नहीं, माता-पिता का साथ भी चाहिए

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लखनऊ में एक नाटक 'एक बच्चे की डायरी' ने बच्चों की भावनाओं पर प्रकाश डाला। यह नाटक माता-पिता की अपेक्षाओं के दबाव को दर्शाता है। समीर नाम के बच्चे की कहानी दिखाई गई जो अकेलेपन से जूझता है। डायरी के माध्यम से उसकी आवाज सामने आती है।

children need not just facilities but parents company and understanding message of ek bachche ki diary play

nNBT न्यूज, लखनऊ

तेज़ रफ्तार और आधुनिक जीवनशैली के बीच जब बच्चों की भावनाएं कहीं पीछे छूट जाती हैं, तो उसके क्या परिणाम हो सकते हैं, इसी संवेदनशील विषय को नाटक “एक बच्चे की डायरी” ने मंच पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। सोमवार को अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान में नाटक के साथ डॉ. करुणा पाण्डेय के उपन्यास का लोकार्पण भी किया गया।

संस्कृति विभाग उत्तर प्रदेश के सहयोग से लखनऊ लिट्रेरी क्लब की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में नाटक का निर्देशन ज्ञानेश्वर मिश्र ‘ज्ञानी’ ने किया। कहानी समीर नाम के एक संवेदनशील बच्चे के इर्द-गिर्द घूमती है, जो माता-पिता की अपेक्षाओं और तुलना के दबाव में घुटता रहता है। मां अपने बेटे को बेहतर जीवन देने की कोशिश में उसकी भावनाओं को समझ नहीं पाती, जिससे समीर अकेलेपन का शिकार हो जाता है। डायरी उसके मन की आवाज बनती है, जो अंततः परिवार को अपनी गलतियों का एहसास कराती है। नाटक यह संदेश देता है कि बच्चों को केवल सुविधाएं नहीं, बल्कि समझ, समय और स्नेह भी उतना ही जरूरी है।