बारहनाजा यानी 12 तरह के अनाज को एक साथ उगाना। आजकल पहाड़ों पर ऐसी खेती कम होती जा रही है। पलायन के कारण गांव खाली हो रहे हैं और घर व खेत वीरान पड़े हैं। ऐसे में पारंपरिक खेती को बचाए रखना बड़ी चुनौती है। मुझे याद है कि बचपन में खेती और पशुपालन पहाड़ के लोगों की आजीविका के मुख्य आधार थे, लेकिन अब इनमें उनकी रुचि कम हो रही है। इसकी वजह जमीन का कम होना और जंगली जानवरों से फसलों को होने वाला नुकसान। ऊपर से जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं ने स्थिति को और कठिन बना दिया है।
ऐसे में टिहरी जिले के जड़धार गांव के विजय जड़धारी से मिलना बहुत सुखद लगता है। वह बारहनाजा खेती को बचाने की मुहिम चला रहे हैं। उन्होंने बताया कि विदेशी वैज्ञानिक भी इस पारंपरिक खेती को समझने के लिए दूर-दूर से हेवल घाटी आते हैं। उनकी बातों से लगता है कि पहाड़ों को लेकर प्राचीन काल का अनौपचारिक विज्ञान आज के आधुनिक विज्ञान के मुकाबले अधिक टिकाऊ और व्यावहारिक है। पारंपरिक खेती महज व्यवसाय नहीं, एक से दूसरी पीढ़ी को मिलने वाली अमूल्य विरासत है। इसी वजह से पहाड़ों पर कहा जाता है कि दुनिया में सएब कुछ मिल सकता है, लेकिन जीवन और आजीविका के लिए उपजाऊ मिट्टी जरूरी है। विजय जड़धारी बताते हैं कि बारहनाजा खेती में मंडवा (रागी) मुख्य फसल होती है। इसके साथ रामदाना, ज्वार, मक्का, राजमा, गहत, भट्ट, उड़द और लोबिया जैसी कई फसलें एक साथ बोई जाती हैं। बारहनाजा की कटाई के बाद खेतों को अक्टूबर से मार्च तक खाली छोड़ दिया जाता है। पहले लोग इस दौरान पशुओं को खेतों में चरने देते थे, जिससे उन्हें चारा मिलता था और खेतों को प्राकृतिक खाद। यूं आराम के बाद जब खेत दोबारा जोते-बोए जाते तो भरपूर पैदावार देते।
विजय ने तीन दशक पहले बीज बचाओ आंदोलन की शुरुआत की थी। पहाड़ के उत्पादों को सार्वजनिक मंचों पर पहचान दिलाने की उनकी कोशिश अब रंग ला रही है। आज लोग एक बार फिर मोटे अनाज की ओर लौट रहे हैं, बल्कि अब तो ये उनकी जरूरत बनते जा रहे हैं। मंडवा से बने उत्पादों की ब्रैंडिंग हो रही है, ये बाजार में आ रहे हैं। बारहनाजा और बीज बचाओ आंदोलन का असर अब दिखने लगा है। विदेशी वैज्ञानिक भी पहाड़ की इस परंपरागत कृषि तकनीक और बीज संग्रहण की विधा से रूबरू हो रहे हैं। कोविड के वक्त अमेरिकी शोधार्थी अध्ययन के लिए यहां आए थे। हाल में ही श्रीलंका और जर्मनी के वैज्ञानिकों की टीम पहुंची थी। जलवायु परिवर्तन की वजह से जब खाद्य संकट बढ़ने का अंदेशा जताया जा रहा है, तब बारहनाजा उम्मीद की किरण है। हमारे भविष्य को शायद अब पुरातन ही बचाएगा।

