प्रख्यात संतूर वादक पंडित तरुण भट्टाचार्य को पद्मश्री पुरस्कार देने की घोषणा हुई है। पिछले साल ही उन्हें तानसेन सम्मान मिला था। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में पांच दशक से सक्रिय, 23 दिसंबर 1957 को बंगाल में जन्मे भट्टाचार्य विख्यात सितार वादक पंडित रविशंकर के शिष्य हैं और विश्व के विभिन्न देशों में अपनी प्रस्तुतियां दे चुके हैं। संतूर में प्रयोग करने के लिए उनकी ख्याति रही है। इसके अलावा, गुरु-शिष्य परंपरा में संगीत शिक्षा के लिए संतूर आश्रम की भी स्थापना की है। आलोक पराड़कर ने उनसे लंबी बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश:
n पहले तानसेन सम्मान और अब पद्मश्री, कैसा लग रहा है?
काफी खुशी हो रही है। राष्ट्रीय सम्मान का खासा महत्व है। सम्मान का अर्थ प्रेरणा भी है और इससे यह भी पता चलता है कि हमारा काम लोगों तक पहुंच रहा है और वे इसे पसंद कर रहे हैं। मगर, सम्मान के साथ जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। अब ज्यादा जवाबदेही भी महसूस हो रही है।
n पंडित शिवकुमार शर्मा और पंडित भजन सोपोरी भी संतूर को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में प्रतिष्ठित स्थान दिलाने के लिए प्रयासरत थे। आपके प्रयास उनसे कैसे अलग हैं?
हर कलाकार की अपनी शैली है। हर व्यक्ति अपने तरीके से प्रयोग करता है। पंडित शिवकुमार शर्मा और पंडित भजन सोपोरी ने संतूर के लिए बहुत कुछ किया है। उन्होंने काफी प्रयोग भी किए हैं। मेरी कोशिश संतूर को उसके प्राचीन रूप शततंत्री वीणा में वापस लाने का है। संतूर भारतीय वाद्य है और प्राचीन काल में शततंत्री वीणा के रूप में लोकप्रिय रहा है। मैं इसकी ध्वनि को वीणा का रूप देना चाहता हूं। इसी कारण मैंने इसमें मोटा तार लगाया है और मींड एवं गमक के नए-नए काम किए हैं। इसे बजाने के ढंग में, इसके आकार में मैंने प्रयोग किए हैं और इसे सितार और सरोद की तरह बजाने का प्रयास किया है। आज संतूर पर भी दूसरे वाद्यों की तरह रागों का वादन हो पा रहा है। मैंने इसमें मनका लगाने का प्रयोग किया है, जो तारों को सटीक रूप से सुर में रखता है।
n पिता रवि भट्टाचार्य से ही आपने संगीत सीखा है। क्या वह भी संतूर वादक थे?
पिताजी शौकिया संतूर बजाते थे। मुख्यत: वह सितार बजाते थे। मैंने पिताजी के दोस्त दुलार राय जी से सीखा है। उन दोनों की जुगलबंदी होती थी। मुझे बचपन से ही संतूर आकर्षित करता रहा है।
n आप प्रसिद्ध सितार वादक पंडित रविशंकर से भी जुड़े। उनका क्या असर रहा?
रविशंकर जी से मेरी भेंट 1982 में हुई और फिर मैंने उनसे सीखना शुरू किया। उनसे मुझे संगीत की गहराई, राग का चिंतन मिला। उन्होंने संतूर के लिए नई तकनीक बताई। सितार की चीजें उन्होंने मुझे संतूर पर बजानी सिखाईं। मनका लगाने का विचार भी उन्हीं से मिला। न सिर्फ संगीत में बल्कि मेरे जीवन में उनका बहुत योगदान है।
n आप पाश्चात्य संगीत के साथ फ्यूजन भी करते हैं, कैसा लगता है?
मैं इसे फ्यूजन नहीं कहता। मेरे हिसाब से ब्लेंडिंग उपयुक्त है। मेरा मानना है कि ऐसे कार्यक्रमों में आधे रास्ते हम आते हैं और आधा रास्ता दूसरा कलाकार तय करता है। फिर दोनों मिलकर चलते हैं। मैंने चीनी कलाकारों के साथ ऐसा ही किया था। ऐसे कार्यक्रमों की काफी तैयारी करनी होती है, पहले काफी समय तक एक-दूसरे का संगीत सुनना और समझना होता हैं। मैं उन कलाकारों में नहीं हूं जो सीधे मंच पर पहुंच कर फ्यूजन शुरू कर देते हैं।
n आपने राग 'त्रिवेणी' की रचना की, जो नदियों को समर्पित है। आप 'गंगा' राग भी बना चुके हैं। नदियों से इस खास अनुराग का कारण?
ऐसे रागों का उद्देश्य नदियों के प्रति लोगों को जागरूक करना रहा है। 'गंगा' राग स्वच्छ गंगा अभियान को समर्पित था। इसी प्रकार 'त्रिवेणी' भी लोगों को नदियों के प्रति सचेत करने के लिए बनाया था। मैं चाहता हूं कि लोग नदियों को स्वच्छ रखें।
n आपने संतूर आश्रम की स्थापना की है, इसके पीछे क्या भावना है?
संतूर आश्रम की स्थापना का उद्देश्य ऐसे लोगों को संगीत शिक्षा देना है जो आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं। संगीत सीखने का अधिकार हर किसी का है। आर्थिक रूप से अक्षम होने पर इसमें रुकावट नहीं आनी चाहिए। मुख्य बात प्रतिभा की है। इस भावना के साथ ही संतूर आश्रम की स्थापना की गई है। यह हावड़ा और कोलकाता में है। संतूर आश्रम में गुरु-शिष्य परंपरा में निःशुल्क शिक्षा दी जाती है, साज भी दिए जाते हैं और एक बार सीख जाने पर उनके कार्यक्रमों का प्रबंध भी किया जाता है।
n भविष्य में क्या करना चाह रहे हैं?
संतूर को और अधिक प्रसिद्ध करना चाहता हूं। इसे सितार, सरोद या तबला की तरह लोकप्रिय करना चाहता हूं। इसकी ध्वनि दुनिया के कोने-कोने में फैलाना चाहता हूं। मेरी इच्छा है कि नई पीढ़ी अधिक से अधिक संतूर सीखे। इसके लिए मैं विद्यालयों में कार्यक्रम करता हूं। युवाओं-विद्यार्थियों के बीच अधिक से अधिक जाता रहता हूं।

