गली में हलचल है, स्कूल की छुट्टी है, लेकिन हमारे सपूत सुबह 6 बजे उठकर बिना कहे नहा लिए। गेट खोलकर बाहर जाने लगे तो हमने पूछा, कहां? इग्नोर करते हुए बोले, आपको पता नहीं है, आज हम लोगों का कमाई का दिन है। बेटा जी पड़ोस में रहने वाले अपने हमउम्र को बुलाने उसके घर पहुंच गए। दोनों गली में खड़े होकर इंतजार करने लगे। इतने में कुछ छोटी बच्चियां टोली बनाए एक घर से निकलीं और दूसरे में घुस गईं। ये दोनों भी उस घर में घुसे, कुछ मिनटों बाद मुंह लटकाए बाहर आ गए।
सपूत क्रोध में थे, दोस्त के आंसू बह रहे थे। 9 साल के छोकरे बिना कहे सुबह 6 बजे उठकर नहा लें फिर आंसू बहाएं… कुछ समझ नहीं आया। पास पहुंचकर पूछा, क्या हुआ? बेटा बोला, छोड़िए, आप नहीं समझेंगे। मन में सोचा, अपनी मां पर गया है। फिर पूछा- बताओ तो हुआ क्या? सपूत नाक फुलाकर बोले, पापा यार ये चीटिंग है। लास्ट ईयर हमें हर घर में बुलाया था आज कोई पूछ नहीं रहा। माजरा समझ आया। ये लोग कन्या खाने के लिए भटक रहे थे। लेकिन समस्या यह थी कि इन दोनों को यह समझाया कैसे जाए। ईशान तो फिर भी बात करने की हालत में थे, उनके दोस्त आयुष की हालत काफी खराब थी। आंसुओं की ऐसी धार बह रही थी जैसे अमेरिका ने तेल के कुओं पर कब्जा कर लिया हो। इतने में जख्मों पर नमक छिड़कने कन्यााओं की टोली निकली। सब इन्हें चिढ़ा रही थीं- मालूम सुबह से हमें इत्ते सारे रुपये मिले हैं। अभी तो और जगह जाना है। अब दोनों भाई जमीन पर लोटने लगे। आयुष को उनके पिता ले गए, ईशान को हमने उठाया और 100 का एक नोट देते हुए कहा, देखो तुम्हें तो बिना कहीं गए 100 रुपये मिल गए, दिखा दो सबको। ईशान ने हिचकियां लेते हुए पूछा, पापा बॉएज का कोई फेस्टिवल क्यों नहीं होता? हमने तुरंत कहा, करवा चौथ। ईशान ने हिकारत से कहा, उसमें आप क्या करते हो, करती तो सब मम्मा है। आप तो कुर्ता पाजामा पहनकर छत पर खड़े हो जाते हो चांद देखने।… हूबहू अपनी मां पर गया है।



