तेल-गैस पर चीन से सीख सकता है भारत

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भारत तेल और गैस के लिए विदेशों पर बहुत अधिक निर्भर हो गया है। चीन ने पाइपलाइन के माध्यम से आयात बढ़ाकर इस निर्भरता को कम किया है। भारत को भी अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए वैकल्पिक स्रोतों और पाइपलाइन परियोजनाओं पर ध्यान देना चाहिए। यह स्थिति भविष्य में गंभीर संकट पैदा कर सकती है।

india learns from china in oil gas imports emphasis on pipelines and renewable energy to reduce import dependence

खाड़ी क्षेत्र की अशांति से भले अभी भारत में तेल-गैस की भारी किल्लत नहीं हुई हो, लेकिन हालात इसी दिशा में बढ़ रहे हैं। कुछ राज्यों में चुनाव होने वाले हैं तो केंद्र सरकार ने अपना टैक्स घटाकर ईंधन की कीमतें काबू में करने की कोशिश की है। जिनका पेशा बाजार को उम्मीद बंधाए रखने का है, वे कह रहे हैं कि अप्रैल के दूसरे हफ्ते से हालात संभलने लगेंगे। यह सब ठीक है, लेकिन इस सवाल पर बात करने की जरूरत अभी किसी को महसूस नहीं हो रही कि बाहर से आए तेल और गैस पर हम दिनोंदिन अत्यधिक निर्भर क्यों होते जा रहे हैं।

चीन से तुलना । भारत तेजी से विकसित हो रहा है। तेल-गैस के नए स्रोत हमारे यहां मिल ही नहीं रहे तो हम क्या करें - पूछने वालों का मुंह बंद करने वाले ये जवाब हमने रट लिए हैं। इन्हें एक तरफ रखकर हमें पिछले 25 बरसों में भारत और चीन के तेल-गैस आयात के आंकड़ों की तुलना करनी चाहिए। निश्चित रूप से, चीन भी विकसित होता हुआ देश है। मौजूदा सदी में विकास की तेज रफ्तार के बावजूद तेल-गैस की ऐसी कोई नई खोज वहां भी नहीं हुई है।

बचने के तरीके । आयातित कच्चे तेल और गैस पर निर्भरता घटाने को लेकर 2007-08 में खूब बहस हुई। तब कच्चे तेल का दाम साल भर में दोगुना हो गया था। चीन अपने यहां होने वाले ओलिंपिक खेलों को ध्यान में रखते हुए अपना रिजर्व स्टॉक बढ़ा रहा था। फिर अमेरिका में बैंकों के दिवालिया होने से डॉलर की कीमत नीचे आई तो डॉलरों में ही चलने वाला तेल का बाजार भाव रॉकेट की तरह उड़ गया। तब यह चर्चा भी थी कि तेल के कुएं अब सूखने लगे हैं।

नियंत्रित रुख । उस वक्त भारत अपनी जरूरत का 80% और चीन 54% तेल बाहर से मंगा रहा था। संकट चला गया और कच्चा तेल 147 डॉलर प्रति बैरल से लुढ़क कर 50-60 डॉलर पर आ गया। बाहर से तेल मंगवाने की चीनी रफ्तार ओलिंपिक्स के बाद भी रेकॉर्ड तोड़ ऊंचाइयां छूती गईं। 2015 में यह देश अपनी जरूरत का 70% तेल आयात कर रहा था। उसके बरक्स भारत का रुख तब नियंत्रित रहा और उसका आयात 80 से बढ़कर 82% पर ही गया।

भारत-चीन में अंतर । तब से अब तक भारत और चीन में दो काम बहुत अलग किस्म के हुए। पहला, भारत का तेल आयात बढ़कर कुल जरूरतों के 89% तक जा पहुंचा है, जबकि चीन के मामले में यह 73% से आगे नहीं बढ़ा। दूसरा, चीन अपना 8-10% तेल कजाखस्तान, रूस और बर्मा से पाइपलाइनों के जरिये मंगाने लगा। समुद्र के रास्ते आने वाले तेल पर उसकी निर्भरता 63-65% ही रह गई है। इसके बरक्स आज भी भारत 89% आयातित तेल समुद्री मार्गों से ही मंगा रहा है।

पाइपलाइन से गैस । गैस की स्थिति थोड़ी बेहतर है। सन 2000 तक भारत की गैस की जरूरतें घरेलू स्रोतों से ही पूरी हो जाती थीं। हालांकि इसका आयात शुरू हुआ तो 2015 में 30% और 2021 में 52% गैस बाहर से मंगाई जाने लगी। अभी 50% नैचुरल गैस बाहर से आती है। चीन अपनी जरूरत का 42 से 45% बाहर से मंगाता है। इसमें 18% हिस्सा कजाखस्तान और रूस से पाइपलाइन के जरिये मंगाई गई गैस का है। समुद्र से आने वाली गैस पर निर्भरता 24 से 27% ही है।

अधूरी योजना । भारत में ईरान और ताजिकिस्तान से पाइप्ड गैस लाने की ‘तापी परियोजना’ कोमा में जा चुकी है। नतीजतन, तेल और गैस के आयात के लिए समुद्री रास्तों पर हमारी निर्भरता लगातार बढ़ रही है। पिछले कुछ बरसों में सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा के दोहन पर काफी काम हुआ। मगर, उत्पादन के स्तर पर भारत के कुल ऊर्जा उपयोग में इनका हिस्सा 10% तक ही है। हमारी कुल ऊर्जा जरूरतों का 25% नॉन-फॉसिल स्रोतों से आता है, जिसमें 8% पनबिजली, 2.5% परमाणु ऊर्जा और 4.5% परंपरागत स्रोत (लकड़ी, उपले आदि) शामिल हैं। चीन में कुल ऊर्जा जरूरतों का 42% नॉन-फॉसिल एनर्जी से आ रहा है।

सबक भूले । 2008-09 के संकट के समय कम कोयले वाली खदानों में सुपरहॉट भाप छोड़कर डीजल बनाने का खयाल आया था। उस हड़बड़ी में ही औद्योगिक घरानों को कोयले की अनखुदी खदानें फटाफट बांट दी गई थीं, जो बाद में UPA सरकार की बदनामी और विदाई की वजह बनीं। कमाल है कि वे सारे किस्से हम इतनी जल्दी भूल गए और तेल-गैस इतने इत्मीनान से मंगाने-खर्चने लगे, जैसे ये इफरात में हों। अब सवाल है कि क्या मौजूदा संकट हमें पहले से ज्यादा देर तक सचेत रखेगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)