LDF और UDF में किसे फ़ायदा कराएगी BJP

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केरल विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटरों का रुख अहम है। बीजेपी की बढ़ती सक्रियता ने एलडीएफ और यूडीएफ दोनों को प्रभावित किया है। दोनों गठबंधन बीजेपी को रोकने का दावा कर रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में मुस्लिम वोटरों ने यूडीएफ का साथ दिया था। इस बार भी बीजेपी की मौजूदगी मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण को प्रभावित कर सकती है।

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पूनम पाण्डे

केरल विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटर किस तरफ जाएंगे, इसमें BJP एक बड़ा फैक्टर बनती दिख रही है। राज्य में 9 अप्रैल को वोटिंग है और LDF व UDF - दोनों ही अल्पसंख्यकों का वोट पाने की कोशिश में हैं। जिस तरह दोनों गठबंधनों के नेता एक-दूसरे पर BJP की बी-टीम होने का आरोप लगा रहे हैं, उससे साफ है कि दोनों को पता है कि मुस्लिम वोटर्स की दिशा तय करने में BJP एक अहम फैक्टर है।

मुस्लिम वोटों की लड़ाई

केरल में ऐसा पहले भी होता रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान ज्यादातर लोगों को चिंता थी कि कहीं राज्य का सांप्रदायिक सौहार्द खराब ना हो। अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के लिए तब भी BJP बड़ा फैक्टर थी और उसके खिलाफ उन्हें UDF ही मजबूत लगी। तब जनता में सरकार को लेकर नाराजगी भी थी। नतीजे आए तो 20 लोकसभा सीटों में से 18 पर UDF उम्मीदवारों को जीत मिली थी। इसी वजह से इस बार दोनों गठबंधन दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि वे ही BJP का मुकाबला कर सकते हैं। केरल की राजनीति लंबे वक्त से इन दो अलायंस के बीच ही घूमती रही है। पहले हर 5 साल में सत्ता बदल जाती थी, लेकिन 2021 में पहली बार यह परंपरा टूटी और LDF ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाई।

राज्य में मुस्लिम आबादी करीब 26.5% है। उत्तर के जिलों - मलप्पुरम, कोझिकोड, वायनाड, कन्नूर और कासरगोड में अल्पसंख्यक वोट ही निर्णायक होते हैं। परंपरागत रूप से ये वोट कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF के साथ रहे और इसके पीछे गठबंधन में शामिल इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) बड़ी वजह थी। हालांकि पिछले दो विधानसभा चुनावों में LDF ने इस आधार में सेंध लगाई है। थिंक टैंक सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी रिसर्च के पोस्ट पोल सर्वे के मुताबिक, 2021 में करीब 65% मुस्लिम वोट UDF को मिले। लगभग 30% वोट LDF की तरफ गए।

किधर जाएंगे मुस्लिम वोटर

इसी वोट बैंक पर BJP का अप्रत्यक्ष प्रभाव दिखता है। पार्टी का केरल में वोट शेयर भले सीमित हो, लेकिन उसकी मौजूदगी और बढ़ती राजनीतिक सक्रियता ने विपक्षी दलों की रणनीति को प्रभावित किया है। माना जा रहा है कि ज्यादातर मुस्लिम मतदाता यह देखकर वोट दे सकते हैं कि किसे रोकना है और कौन रोक सकता है। इसीलिए केरल में कांग्रेस और सीपीएम के बीच आरोप-प्रत्यारोप का एक बड़ा मुद्दा यही है कि कौन BJP के खिलाफ ज्यादा मजबूती से खड़ा है।

लोकसभा चुनावों में मुस्लिम वोटों का UDF की तरफ झुकाव साफ था, खासकर उत्तर के इलाकों में। यहां UDF ने लगभग क्लीन स्वीप किया। हालांकि विधानसभा चुनाव में पैटर्न अलग था। केरल में BJP अहम फैक्टर बनती जा रही है और उसे कुछ सफलता भी मिली है। पार्टी की हालिया राजनीतिक उपलब्धियां भले सीमित हों, लेकिन प्रतीकात्मक रूप से अहम हैं। त्रिशूर लोकसभा सीट पर जीत और तिरुवनंतपुरम नगर निगम में सफलता ने इस नैरेटिव को भी मजबूत किया है कि BJP अब नॉन-फैक्टर नहीं रही। यह नैरेटिव ही विपक्षी वोटों के ध्रुवीकरण को प्रभावित कर रहा है।