5 राज्यों-केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा चुनाव की सरगर्मी बढ़ गई है। हर जगह राजनीतिक समीकरण अलग-अलग हैं, लेकिन एक बात कमोबेश समान है - लोकलुभावन योजनाओं का वादा। बंगाल में ममता सरकार ने लक्ष्मी भंडार योजना की धनराशि बढ़ाने और बेरोजगार युवाओं को वित्तीय सहायता देने का ऐलान किया है। असम में कांग्रेस ने कहा है कि अगर वह सरकार में आई तो महिलाओं को अपना उद्यम शुरू करने के लिए 50 हजार रुपये देगी। वहीं, तमिलनाडु की एक पार्टी AMMK ने जनता से 120 वादे कर दिए हैं, जिसमें किसानों की कर्ज माफी भी है।
घोषणाओं की बाढ़ । अभी वोटिंग में वक्त है और कई दलों के घोषणापत्र आने बाकी हैं, तो इस तरह के और ऐलान देखने को मिल सकते हैं। यह अब बेहद कॉमन ट्रेंड बन चुका है, जहां किसी के चुनावी घोषणापत्र को छोटा दिखाने के लिए उससे भी बड़ी-बड़ी घोषणाएं कर दी जाती हैं। पिछला हालिया उदाहरण बिहार है, जहां विधानसभा चुनाव के दौरान सरकारी नौकरी के वादे किए गए थे और NDA सरकार ने महिलाओं को रोजगार योजना के तहत 10,000 रुपये की राशि दी थी।
राजनीतिक आड़ । फ्रीबीज यानी मुफ्त की योजनाओं को हमेशा जनता की जरूरत के रूप में पेश किया जाता है। हालांकि हकीकत में यह एक तरह से वोट खरीदने का जरिया है। मुफ्त की योजनाओं के शोर में अक्सर नए रोजगार के मौके पैदा करने और दूसरे जरूरी मुद्दे दब जाते हैं।
बढ़ता कर्ज । आंकड़े बताते हैं कि 2018-19 में राज्य और केंद्र शासित प्रदेश सब्सिडी पर कुल 1.87 लाख करोड़ रुपये खर्च कर रहे थे, 2024-25 में यह आंकड़ा 4.72 लाख करोड़ रुपये हो गया। यह राज्यों के कुल खर्च का लगभग 10% है। राज्यों का कर्ज बढ़ रहा है, पर वे रेवड़ी कल्चर से तौबा नहीं कर रहे। मसलन, बंगाल में 2023 में GDP के मुकाबले कर्ज 34% था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बंगाल पर करीब 8 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है और तमिलनाडु पर साढ़े 9 लाख करोड़ का।
तरक्की पर ब्रेक । रिजर्व बैंक भी ऐसी योजनाओं को लेकर चिंता जता चुका है कि इसकी वजह से सरकारों की वित्तीय स्थिति पर दबाव पड़ता है। जो पैसा इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगना चाहिए, वह लोकलुभावन योजनाओं में खर्च हो जाता है। इससे आर्थिक प्रगति की रफ्तार धीमी होती है। जब बार-बार कर्ज माफ किए जाते हैं, तो लोगों में लोन चुकाने की जिम्मेदारी नहीं रहती। हालांकि, कल्याणकारी योजनाओं और फ्रीबीज को एक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।



