पश्चिम बंगाल में पहली बार बनी BJP सरकार ने काम शुरू कर दिया है। पार्टी ने शुभेंदु अधिकारी को मुख्यमंत्री बनाया, तो कद्दावर नेता दिलीप घोष को नंबर दो की पोजिशन मिली। चार और विधायकों को भी मंत्री बनाया गया, जो BJP के कोर वोट बैंक की नुमाइंदगी करते हैं और जिनकी बदौलत राज्य में पार्टी को भारी जीत मिली।
कैबिनेट से संकेत । शुभेंदु अधिकारी और उनकी पार्टी ने स्पष्ट संकेत दिया है कि इस जीत में मुसलमानों की भूमिका नहीं रही। बंगाल में 28% मुसलमान हैं। इसलिए आगे भी उनका राजनीतिक असर बना रहेगा क्योंकि एक चौथाई से ज्यादा आबादी को लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 1937 के बाद पहली बार बंगाल में बनी सरकार में किसी मुसलमान को जगह नहीं मिली है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे राज्य की राजनीति में अप्रासंगिक हो जाएंगे। खासकर इसलिए क्योंकि BJP की प्राथमिकता में ऐसे मुद्दे हैं, जिनसे मुसलमानों की सोच प्रभावित होगी। साथ ही सामाजिक समीकरणों और चुनावी रणनीतियों पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा।
शुभेंदु के सामने चुनौती । पहली बात तो यह है कि BJP राज्य के 60% से अधिक हिंदू मतदाताओं को गोलबंद करने की कोशिश करेगी। शुभेंदु को बहुसंख्यक समुदाय के वोटों को गोलबंद करने की जिम्मेदारी दी गई थी। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, पार्टी को विधानसभा चुनाव में 45% से ज्यादा वोट मिले भी। उसने घुसपैठियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया और मतदाता सूची से हटाए गए लोगों को भी इसी से जोड़कर पेश किया।
लोगों पर असर । बंगाल में यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) लागू करने और अवैध कब्जे हटाने को भी BJP ने अपनी प्राथमिकता बनाया है। मुख्यमंत्री को इन फैसलों के असर से भी निपटना होगा। सरकारी जमीन से कब्जे हटाने और तुष्टिकरण खत्म करने की नीति का असर अल्पसंख्यक समुदाय पर पड़ सकता है।
TMC पर दबाव । अभी यह साफ नहीं है कि BJP अपनी प्राथमिकताओं को जमीन पर कैसे लागू करेगी। वामदलों ने धार्मिक ध्रुवीकरण के खिलाफ मोर्चा शुरू कर दिया है। ममता बनर्जी फिलहाल शांत हैं, लेकिन TMC पर मुसलमानों के मुद्दों पर स्पष्ट रुख का दबाव बढ़ेगा। पार्टी के 80 विधायकों में 34 मुसलमान हैं। खास बात यह है कि उनके ज्यादातर मुस्लिम विधायक उन्हीं इलाकों से आते हैं, जहां BJP जनसांख्यिकीय बदलाव का दावा कर रही है।
प्रभावी छवि जरूरी । जब BJP घुसपैठियों को बाहर निकालने जैसे अपने वादों पर काम शुरू करेगी, तब सीएम के सामने सबसे बड़ी चुनौती TMC होगी। बंगाल पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए BJP को TMC को इतना कमजोर करना पड़ेगा कि वह हाशिये पर चली जाए। दूसरी ओर, शुभेंदु को एक मजबूत और प्रभावी नेता की छवि बनानी होगी, लेकिन हिंसा और टकराव जैसी स्थितियों को भी संभालना होगा। इसके लिए TMC के संगठन और प्रभाव को चुनौती देना जरूरी होगा।
डबल इंजन का फायदा । एक तरह से शुभेंदु पर नीति-निर्माण का पूरा बोझ नहीं होगा, क्योंकि डबल इंजन सरकार में कई बड़े फैसले केंद्र की रणनीति के अनुसार होते हैं। इससे मुख्यमंत्री का काम आसान भी होता है और एक तरह से चुनौतीपूर्ण भी। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि शुभेंदु को नीतियों में अपनी सोच के मुताबिक बदलाव करने की कितनी आजादी मिलेगी।
महिलाओं के मुद्दे । BJP का मानना है कि आर्थिक गिरावट, खराब कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग ने ममता सरकार के खिलाफ माहौल बनाया। महिला सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा रही। हालांकि, आंकड़ों के हवाले से चुनाव विशेषज्ञ बताते हैं कि महिलाओं का समर्थन अब भी BJP के मुकाबले ममता बनर्जी को ज्यादा मिला है।
कानून व्यवस्था । बंगाल की आर्थिक स्थिति सुधारने में शुभेंदु को डबल इंजन सरकार का फायदा मिल सकता है। BJP के लिए बंगाल बेहद अहम राज्य है, इसलिए केंद्र से सहयोग मिलने की उम्मीद रहेगी। लेकिन कानून-व्यवस्था संभालना मुख्यमंत्री के लिए ज्यादा चुनौतीपूर्ण रहेगा। वह इसके लिए पुलिस प्रशासन में बड़े बदलाव कर सकते हैं। फिर भी, BJP के वैचारिक और राजनीतिक एजेंडे के बीच तालमेल बिठाना आसान नहीं होगा। खासकर, प्रशासन की निष्पक्ष छवि बनाना।
महत्व बनाना होगा । इतना ही नहीं, BJP के बंगाल चेहरे के तौर पर शुभेंदु अधिकारी को खुद को पार्टी के लिए बेहद जरूरी नेता साबित करना होगा। असम में हिमंत बिस्वा सरमा इसका उदाहरण हैं। बंगाल में BJP पहली बार सत्ता में आई है। उसकी कामयाबी नई है। इसलिए पार्टी की छवि और संगठन को संभालकर रखना अधिकारी की सबसे बड़ी चुनौती होगी।


