ग्रीष्म ऋतु की तपती दोपहर में जब धरती जलने लगती है और सूरज की तीखी किरणें शरीर को झुलसाने लगती है, तब हम बेचैन हो उठते हैं। यह तो हुई बाहर की गर्मी। इससे बचने के लिए लोग छांव खोज लेते हैं - पंखे, कूलर, एसी की ठंडी हवा का सहारा ले लेते हैं। लेकिन, मन के भीतर उठती गर्मी से बचने का ऐसा आसान उपाय नहीं होता।
हर इंसान के भीतर एक आग होती है। किसी के भीतर वह सपनों और मेहनत की रोशनी बनती है, तो किसी में गुस्से और अधीरता की लपट बनकर बाहर आने लगती है। आग का स्वभाव ही ऐसा है, वह केवल जलती नहीं, अपने आसपास की हर चीज को प्रभावित भी करती है।
आज जीवन की भागदौड़ ने मनुष्य को भीतर से थका दिया है। काम का दबाव, भविष्य की चिंता, आर्थिक असुरक्षा और हर समय दूसरों से बेहतर दिखने की होड़ ने मन की शांति को कम कर दिया है। यही कारण है कि छोटी-सी बात पर लोग नाराज हो जाते हैं। कई बार समस्या सामने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि भीतर जमा तनाव होता है, जो बाहर आने का अवसर खोज रहा होता है। इसका असर सबसे अधिक दिखाई देता है रिश्तों पर। अध्यात्म इसलिए अग्नि को केवल विनाश नहीं मानता।
दीपक की लौ भी आग है और जंगल की आग भी। जब भीतर की आग संयम से जुड़ती है, तो वही ऊर्जा बन जाती है। लेकिन, जब वही आग अहंकार और क्रोध से जुड़ जाती है, तब सबसे पहले मन की शांति को ही राख कर देती है। जरूरत है शांत स्वभाव बनाए रखने की। कभी आग से आग नहीं बुझती। इंसान के भीतर का ताप केवल धैर्य और समझ से ही शांत हो सकता है। कोशिश बस इतनी हो कि हमारे भीतर की आग किसी को जलाए नहीं। हां, किसी के अंधेरे में थोड़ी-सी रोशनी जरूर दे जाए।


