लोहे के हल ने संवारा यूरोप का भाग्य

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यूरोप का भाग्य लोहे के हल ने संवारा। कृषि में क्रांति आई, उत्पादन बढ़ा। चांदी की खोज से मुद्रा का चलन तेज हुआ। नए शहरों का उदय हुआ, व्यापार बढ़ा। कारीगरों ने गिल्ड बनाए। इससे संगठित बाजार अर्थव्यवस्था की शुरुआत हुई। लोगों के जीवन स्तर में सुधार आया और नवाचार को बढ़ावा मिला।

iron plough changed europes destiny journey from feudalism to market economy

अभिषेक मिश्र

यूरोप का समाज जब सामंती ढांचे में जकड़ा हुआ था, तब किसानों की पूरी निर्भरता जमींदारों और गिरजाघरों पर थी। उस समय कई ऐसे बदलाव शुरू हुए, जिन्होंने इस व्यवस्था को हिलाकर रख दिया। इतिहासकार बताते हैं कि 11वीं सदी के आसपास तकनीक में आए बदलावों और आर्थिक परिवर्तनों ने सामंती अर्थव्यवस्था के पतन की शुरुआत की।

स्वर्ग का लालच । आयरिश अर्थशास्त्री और लेखक डेविड मैकविलियम्स ‘Money: A Story of Humanity’ में लिखते हैं कि मध्य युग के शुरुआती दौर में उत्तरी-पश्चिम यूरोप की अर्थव्यवस्था करीब ठहरी हुई थी। तब सिक्कों का चलन भी बहुत कम था और ज्यादातर लेनदेन बार्टर सिस्टम के जरिये ही किया जाता। उस दौरान किसान अपनी उपज का अधिकांश हिस्सा सामंतों और चर्च को देते थे। इसके बदले उन्हें सुरक्षा मिलती थी और कहा जाता था कि वे मरने के बाद स्वर्ग जाएंगे। लेकिन, उनके पास आर्थिक आजादी नहीं होती थी।

तकनीक से बदलाव । ठप पड़ी इस व्यवस्था में कृषि तकनीक में आए परिवर्तन ने जान फूंक दी। भारी-भरकम लोहे के हल से खेती आसान हुई और उत्पादन बढ़ा। किसानों के लिए पहले गीले खेतों को जोतना लगभग नामुमकिन होता था। लेकिन, लोहे के हल से काम आसान हो गया। इसके बाद बड़े पैमाने पर खेती होने लगी। इससे पैदावार बढ़ी और किसानों के पास अतिरिक्त अनाज बचने लगा। यही अतिरिक्त उपज आर्थिक बदलाव की नींव बनी। इतिहासकार बताते हैं कि किसान अपने अनाज को बाजार में बेचने लगे, जिससे उनकी कमाई बढ़ी।

खेती के परे दुनिया । उसी जमाने में जर्मनी के गोस्लार में चांदी की खोज की गई। इसने पूरे यूरोप में मुद्रा के फिर से प्रसार को गति दे दी। फिर बड़ी संख्या में चांदी के सिक्के ढाले जाने लगे। इससे व्यापार को रफ्तार मिली और धीरे-धीरे लेनदेन के लिए बार्टर सिस्टम की जगह सिक्कों ने ले ली। सिक्कों का बढ़ता चलन और अनाज के अत्यधिक उत्पादन के कारण छोटे-छोटे बाजार बनने लगे और कस्बों की शुरुआत हुई। नए शहर बसाने के फरमान दिए गए, जहां व्यापार और कारीगरी को खूब बढ़ावा मिला। इसके बाद किसान भी खेतों तक सीमित नहीं रहे। उनकी अगली पीढ़ियां शहरों का रुख करने लगीं और नए पेशों में हाथ आजमाने लगीं।

अर्थव्यवस्था की शुरुआत । इकॉनमी के इतिहास की जानकारी रखने वालों की मानें तो यह वही दौर था जब सामंती व्यवस्था दम तोड़ने लगी थी। डेविड के मुताबिक, ‘लोगों को विकल्प मिलने पर नियंत्रण कमजोर होने लगता है।’ नए शहरों के बनने से गांव के किसानों और मजदूरों को वही विकल्प मिलने लगा, जो पहले उनके गांवों में असंभव था। तब कारीगरों ने अपना समूह बनाया और उसे गिल्ड कहने लगे। जब गिल्ड की संख्या बढ़ने लगी, तब वे व्यापार के नियम भी बनाने लगे। इसके साथ उनका जोर अपने सदस्यों (साथी मजदूरों) के हितों की रक्षा करने पर भी रहा। इसके बाद संगठित बाजार अर्थव्यवस्था की नींव पड़ी।

नवाचार बढ़ा । व्यापार बढ़ने के साथ ही यूरोप भी बाहरी दुनिया से जुड़ने लगा। बाल्टिक क्षेत्र, रूस और भूमध्य सागर के इलाकों से वस्तुओं का आयात बढ़ा। क्वॉलिटी, कीमत और डिमांड जैसे सिद्धांत धीरे-धीरे अपनी जगह बनाने लगे। इन्हीं बदलावों ने माल्थसियन जाल भी तोड़ना शुरू किया, जो कहता था कि उत्पादन और आबादी एक-दूसरे को सीमित करते हैं। उत्पादकता बढ़ने से लोगों ने अपने जीवन स्तर में सुधार करना शुरू किया और नवाचार के रास्ते भी खुले।