'बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, चंदन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग।' यह सुनकर माथा ठनका। पहली लाइन कबीरदास के दोहे की, दूसरी रहीम की। यह क्या गोलमाल है? पीछे मुड़कर देखा तो अपना बल्लू बाश्शा चला आ रहा था।
मेरे चेहरे पर सवाल देख, वह खुद शुरू हो गया, 'अंकल, अमेरिका का बाहुबली कह रहा है कि उसने ईरान को नाकों चने चबवा दिए और अब वह सुलह की भीख मांग रहा है। लेकिन, उसी का एक चंपू रो रहा है कि जंग में 39 अमेरिकी जहाज पुर्जा-पुर्जा हो गए। बाहुबली के मोहल्ले में पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छूने लगे हैं, लेकिन वह अपनी पीठ ठोकने से बाज नहीं आ रहा।'
'लेकिन यह जो तुम गाते आ रहे थे, उसकी क्या तुक है?' बल्लू ने मेरे सवाल को देखा और जाने दिया, जैसा ऑफ स्टंप के बाहर जाती गेंदों के साथ सुनील गावस्कर करते थे। 'अंकल, अपील हुई कि भइए, दुनिया का हाल खराब हो रिया है, अपना घर संभालो, गहने-वहने कम खरीदो। लेकिन एक कह रहा कि बेचेंगे नहीं तो खाएंगे क्या, दूसरा कह रहा कि बिना जेवर के शादी कैसे होगी? अभी बही-खाता चेक होने लगे तो पता चल जाए कि किसके पास खाने को पैसे नहीं हैं और किसके पास गहने खरीदने का कितना माल है।'
मैंने कहा, 'बल्लू, ये सब छोड़, अपने गाने की वजह बता।' पर वह फिर चालू हो गया, 'अंकल, उधर केरल में देखिए। किसी तरह एक सूबे में सरकार बनने की नौबत आई। अपना सीएम तय करने में पसीना-पसीना हुए जा रहे, लेकिन पूरे विपक्षी कुनबे को एकजुट करने की हवाबाजी में कोई कमी नहीं है।' मुझे समझ में आ गया कि आज बल्लू का विकेट मेरे हाथ नहीं आने वाला। उसने कहा, 'ज्यादा सोचने का नहीं अंकल, बेतुके होकर मजे लीजिए। मुंबई में एक आदमी को घर में चूहे ने काटा, वह इलाज के लिए अस्पताल गया। वहां भी चूहे ने काट लिया। आप देख लीजिए, रोना है या हंसना है?'

