शहरी इलाक़ों के पुराने नामों में छिपा है इतिहास

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लाहौर जैसे पुराने शहरों के नाम इतिहास की गवाही देते हैं। कृष्ण नगर, लक्ष्मी चौक जैसे नाम साझा सभ्यता की झलक दिखाते हैं। बंटवारे के बाद बदले नामों को वापस लाने की शुरुआत हो रही है। पुराने नाम सिर्फ़ यादें नहीं, बल्कि अपनी जड़ों को पहचानने का जरिया हैं।

history hidden in old names of urban areas the feeling of connecting with roots

जिन्ने लाहौर नई वेख्या, ओ जम्मेया नई - यानी जिसने लाहौर नहीं देखा, वह जन्मा ही नहीं। किसी शहर की तारीफ में इससे बेहतर और क्या लिखा गया होगा! पुराना लाहौर आज भी कई लोगों के जेहन में है। कृष्ण नगर, लक्ष्मी चौक, राम गली - ये नाम झलक हैं उस साझा सभ्यता के, जिसे बंटवारे के बाद बदलने का प्रयास किया गया। हालांकि यादों को मिटाया नहीं जा सकता। वे किस्सों का रूप ले लेती हैं और इतिहास का हिस्सा बन जाती हैं। इसीलिए बदलने के बाद भी लाहौर उनके लिए नहीं बदला, जिन्होंने उसके पुराने स्वरूप को देखा था और उन्होंने भी उसके वर्तमान में उन शब्दों को ही तलाशने की कोशिश की, जिन्हें अपने बुजुर्गों से इस शहर के बारे में सुना था। यही वजह है शायद कि पाकिस्तान में लाहौर के बंटवारे के पहले के नामों को फिर से लाने की शुरुआत हो रही है।

करीब 8 दशक बाद आज लाहौर को फिर से पीछे मुड़ना पड़ रहा है। क्यों? क्योंकि किसी भी पुराने शहर की पुरानी बसावट के पुराने नाम बस नाम नहीं होते। ईंट-पत्थरों से चौक-चौराहे, सड़कें और मोहल्ले तो तैयार हो जाते हैं, पर याददाश्त उनमें उनके नामों से ही पड़ती है। ये बताते हैं कि इनको किसने बसाया, कौन रहता था वहां, क्या बोलता था और खाता क्या था। जमीन में दबी किसी प्राचीन सभ्यता की तरह ये नाम भी हमेशा उसी जगह रहते हैं, भीतर ही भीतर सांस लेते हुए।

लाहौर हो, लखनऊ, पुरानी दिल्ली या फिर बनारस - इनका हर पुराना नाम एक अध्याय है। सभी के पीछे कोई न कोई कहानी। ठठेरों के रूप बदल गए, पर बनारस की ठठेरी गली उनकी कारीगरी से आबाद है। अमीनाबाद की फूलों वाली गली अब भी महक रही, तो चांदनी चौक का बाजार बताता है कि क्यों सदियों से दुनियाभर के घुमक्कड़ उसके पास खिंचे चले आते हैं।

पुराने नामों को वापस लाने का आनंद सिर्फ Nostalgia का नहीं, अपनी जड़ों को पहचानने का है। जैसे कोई परिवार वर्षों बाद अपने पुश्तैनी घर लौटे और टूटे हुए दरवाजे पर उसका पुराना नाम स्वागत करता मिल जाए। दुनिया के कई देशों में ऐसा हुआ है। सोवियत संघ के विघटन के बाद अलग हुए कई देशों ने रूसी नामों को छोड़कर अपने पुराने नाम वापस अपनाए। भारत में भी बंबई हुई मुंबई और इलाहाबाद बना प्रयागराज। ऐसे उदाहरण अनगिनत हैं।

पुराने नामों की वापसी याद दिलाती है कि मूल को मिटाकर नई पहचान बनाना आसान नहीं होता। शहर आखिरकार अपने अतीत को पुकार ही लेते हैं। और शायद यह अच्छी बात है क्योंकि जो समाज अपनी मिट्टी से जुड़ा रहता है, वही ज्यादा ऊंचा उठ पाता है।