महाराष्ट्र के दहानू में 1905 में जन्मे दत्तात्रेय रामचंद्र कापरेकर जब मात्र आठ वर्ष के थे तभी उनकी माता का देहांत हो गया। उनके पिता ज्योतिषी थे और उन्होंने पुत्र को ज्योतिषीय गणनाओं का ज्ञान दिया। यही कारण था कि दत्तात्रेय को बचपन से ही संख्याओं और गणित से गहरा लगाव हो गया। वह घंटों पहेलियां और गणितीय समस्याएं सुलझाते। कॉलेज के दौरान उनकी गणितीय प्रतिभा के लिए उन्हें ‘हरि नारायण आप्टे पुरस्कार’ मिला। आर्थिक कठिनाइयों के कारण उन्होंने नासिक के पास देवलाली के एक सरकारी स्कूल में गणित अध्यापक के रूप में नौकरी शुरू की और जीवनभर वहीं पढ़ाते रहे। यहीं रहते हुए उन्होंने कई महत्वपूर्ण गणितीय खोजें कीं। उनकी सबसे प्रसिद्ध खोज ‘6174’ संख्या है, जिसे आज ‘ कापरेकर स्थिरांक ’ या ‘ घोस्ट नंबर ’ कहा जाता है। चार अंकों की किसी भी संख्या को बढ़ते और घटते क्रम में लिखकर घटाएं, फिर जो परिणाम आता है उसे भी इसी क्रम में लिखकर घटाएं तो एक समय परिणाम ‘6174’ आएगा। शुरुआत में लोगों ने उनकी खोजों को गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन बाद में विश्वभर के गणितज्ञ उनकी प्रतिभा से प्रभावित हुए। उनकी जीवनगाथा यह सिद्ध करती है कि लगन, अभ्यास और जिज्ञासा से साधारण व्यक्ति भी असाधारण ऊंचाइयां प्राप्त कर सकता है।


