25 साल बाद भी उत्तराखंड के ख्वाब नहीं हुए पूरे

नवभारतटाइम्स.कॉम

उत्तराखंड राज्य की स्थापना को 25 साल बीत चुके हैं। लोगों को रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं की उम्मीद थी। लेकिन आज भी राज्य अपनी परिसंपत्तियों पर पूर्ण स्वामित्व नहीं पा सका है। पलायन और बेरोजगारी जारी है। स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल हैं। शिक्षा के अवसर सीमित हैं। आर्थिक असमानता बढ़ी है।

uttarakhands unfulfilled dreams after 25 years the pain of migration unemployment and neglect

साल 2000 से पहले उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहा उत्तराखंड कभी उत्तरांचल कहा जाता था। भौगोलिक परिस्थितियां शेष राज्य से अलग होने के अलावा यहां के लोगों की पहचान, संस्कृति, भाषा भी अलग थी। स्वयं को उपेक्षित महसूस करते हुए जनता ने रोजगार, शिक्षा, सड़क और स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं को लेकर अलग राज्य की मांग की। लंबे आंदोलन और संघर्ष के बाद 9 नवम्बर 2000 को भारत के 27वें राज्य के रूप में पृथक उत्तराखंड राज्य बन गया। लेकिन, क्या वह स्वाधिकार, जिसके लिए आंदोलन हुआ था, सचमुच हासिल हुआ? ऐसे और भी कई सवालों के जवाब तलाशती है जगदीश ममगांई की पुस्तक ‘स्वाधिकार के लिए छटपटाता उत्तराखंड’। किताब राज्य निर्माण के 25 वर्षों बाद उसकी उपलब्धियों और अधूरे सपनों की पीड़ा पेश करती चलती है।

पहाड़ी क्यों परेशान । ममगांई लिखते हैं कि आज भी राज्य अपनी परिसंपत्तियों, राजस्व अधिकारों, प्राकृतिक संसाधनों पर पूर्ण स्वामित्व नहीं पा सका है। उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम की धारा 79, 80, 81 एवं 82 की आड़ में में आज भी नहरें, जलाशय, बिजली परियोजनाएं और राजस्व का बड़ा हिस्सा यूपी व केंद्र सरकार के पास है। पलायन, बेरोजगारी, बुनियादी ढांचे के विकास, शैक्षिक और रोजगार के अवसरों में उपेक्षा, सक्षम युवाओं का प्रवासन जारी है। पहाड़ सहमा हुआ है। किताब कहती है कि राज्य के हिस्से विस्थापन, आपदा और मौत का हिस्सा आया जबकि लाभांश उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार के हिस्से में गया।

बेरोजगारी और स्वास्थ्य । पुस्तक कहती है कि राज्य बनते समय उत्तराखंड के अवसरवादी नेतृत्व ने परिसंपत्तियों के बंटवारे पर गंभीर विमर्श को दबा दिया। उत्तर प्रदेश की शर्तें बिना विरोध स्वीकार कर लीं। पृथक राज्य बनने से पूर्व पानी और जवानी को उत्तराखंडी अपनी पूंजी बताते थे मगर लैंसडाउन व रानीखेत में जवानों की स्थायी भर्ती नहीं हो रही, जो हो रहीं, वे अग्निवीर योजना के तहत चार सालों में बेरोजगार हो जाएंगे। स्वास्थ्य सेवाओं की बुरी स्थिति ऐसी है कि गर्भवती महिलाओं को अस्पताल तक पहुंचने के लिए पथरीले रास्तों पर पैदल चलना पड़ता है। कई बार मां या बच्चा रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं।

शिक्षा और भूमि कानून । किताब कहती है कि साक्षरता दर अच्छी होने के बावजूद उच्च शिक्षा और तकनीकी प्रशिक्षण के अवसर सीमित हैं। स्कूल बंद हो रहे हैं, शिक्षक नहीं हैं, और हजारों गांव भूतिया बन चुके हैं क्योंकि पलायन लगातार जारी है। किताब यह भी खुलासा करती है कि पहाड़ों में खेती बिखरी हुई है, चकबंदी लागू नहीं हुई, और आत्मनिर्भर गांव अब बाजार पर निर्भर हैं। ममगांई किताब में तर्क देते हैं कि भूमि-साझाकरण लागू होने से बंजर भूमि फिर आबाद हो सकती है। साथ ही, संविधान की पांचवीं अनुसूची में शामिल करने और अनुच्छेद 371 जैसी विशेष शक्तियों की मांग भी सालों से जारी है। जंगली जानवरों के हमले बढ़े हैं, लेकिन वन्य जीवन संरक्षण अधिनियम के चलते अपराध उनसे बचाव करना भी अपराध है।

मौन त्रासदी । किताब सामाजिक विघटन की ओर भी इशारा करते हुए कहती है कि शराबखोरी, घरेलू हिंसा, महिलाओं का संघर्ष मौन त्रासदी में बदल चुका है। यही कारण है कि वहां की महिलाएं ‘नशा नहीं, रोजगार दो’ आंदोलन से भावी पीढ़ी बचाने की कोशिश कर रही है। लेखक कटाक्ष करते हैं कि गरीब प्रदेश दो-दो जगह विधानसभा चला रहा है और साल भर में केवल आठ-नौ दिन सत्र होता है। लेखक पर्यटन के विस्तार को वे दोधारी तलवार मानते हैं क्योंकि इससे तीर्थयात्रा से होने वाली आय तो बढ़ी है मगर नदियां और पवित्र स्थल प्रदूषित हो रहे हैं। वह लिखते हैं- बद्रीनाथ में मलबा बढ़ रहा है, धनी पर्यटकों के आभामंडल में केदारनाथ का भक्तिभाव डूब गया है।

आर्थिक असमानता । अलग राज्य बनने के बाद, पहाड़ी क्षेत्रों के लोगों को अधिक पूंजी निवेश की उम्मीद थी। ढाई दशकों में विकास के लिए फोकस मैदानी इलाकों में रहा, पहाड़ी इलाकों में नहीं। तराई क्षेत्र निवेश और उद्योग का लाभ उठा रहे हैं जबकि पहाड़ी जिलों की प्रति व्यक्ति आय मैदान की तुलना में लगभग आधी है।