लोकतंत्र का लाउंज

नवभारतटाइम्स.कॉम•
loktantra ka lounge the game of politics capital and workers
सियासत के गुण सुखनंदन को विरासत में मिले हैं। वह पिता ही क्या जो अपनी विरासत भावी पीढ़ी को न दे! इसलिए वह सुरम्य को भी इसमें दीक्षित कर रहे हैं। पिता-पुत्र का आज का पाठ था, ‘ उच्च सदन ।’ हालांकि जिज्ञासा सुधर्मा ने व्यक्त की, ‘उच्च सदन का पर्यायवाची क्या है?’ ‘लोकतंत्र का कॉरपोरेट लाउंज, जहां राजनीति और पूंजी का संगम होता है।’ सुखनंदन ने जवाब दिया और सुरम्य से मुखातिब हुए, ‘अंग्रेजों का हाउस ऑफ लॉर्ड्स देख नीति नियंताओं ने उच्च सदन अपनाया। लेकिन, आजादी के बाद लॉर्ड खत्म हो गए। सदन की उच्चता तो बरकरार रखनी है। इसलिए भरपाई कभी माई लॉर्ड, कभी लाट साहब तो कभी सोने की लाट वालों को भेजकर की जाती है।’ ‘उच्च सदन स्थायी क्यों है?’ ‘क्योंकि विचार, सरकार और हार अस्थाई हैं, लेकिन पुनर्वास व पूंजी की आवश्यकता स्थायी है। उच्च सदन इनका प्रतिफल है।’

‘लेकिन, नेता की सबसे बड़ी पूंजी तो उसके कार्यकर्ता हैं?’ सुधर्मा ने बीच में नाराज कार्यकर्ता की तरह टोक दिया। ‘इसे जनाधार कहते हैं, जिससे राजनीतिक पूंजी बनती है और फिर उसका नकदीकरण किया जाता है’, सुखनंदन के चेहरे पर मुस्कुराहट थी। ‘कार्यकर्ताओं को उनकी मेहनत का प्रतिफल कौन देगा?’ स्वर में अब भी नाराजगी थी। ‘प्रिये! कार्यकर्ताओं की मेहनत अनमोल है, उसका मूल्य नहीं लगाया जा सकता। राजनीति में सबकी भूमिका तय है। नेता के पास शक्ति है, वह सत्ता संभालेगा। सेठ के पास संसाधन हैं, पूंजी संभालेगा। कार्यकर्ता के पास निष्ठा है, वह उम्मीद संभालेगा। जब शक्ति और पूंजी मिलेंगे तो कार्यकर्ता ताली बजाएगा।’ तभी नेपथ्य से आवाज आई, ‘अध्यक्ष जी! कार्यकर्ता बाहर गेट पर खड़ा है!’ ‘वह अपनी निर्धारित जगह पर है, तुम गेट बंद कर दो।’ अध्यक्ष जी ने जवाब दिया।