कोई तो अपना हो, जो मन की बात कहे और सुने

नवभारतटाइम्स.कॉम•
having someone to share your thoughts with can help you avoid loneliness and depression
आज बहुत से नौजवान तनाव, अकेलेपन और डिप्रेशन से जूझ रहे हैं। वे अपनी परेशानियां किसी से साझा नहीं करते। बात भीतर दबती और धीरे-धीरे गहरी होती जाती है। पहले संयुक्त परिवार हुआ करते थे। घर में अंकल, मामा, बुआ या दूसरे बड़े-बुजुर्ग होते थे, जिनसे मन की बात कही जा सकती थी। परिवार में अपनापन था। आज परिवार छोटे हुए हैं और कई बार प्रेम की जगह तुलना और ईर्ष्या ने ले ली है।

बाहरी विकास ने हमारी जरूरतों को भी बढ़ा दिया है। पहले सीमित साधनों में भी लोग खुश रहते थे। आज दूसरे के पास बड़ी गाड़ी, बड़ा घर या ज्यादा पैसा देखकर हमें भी वही चाहिए। इच्छाएं असीम और अनंत हैं। दूसरों को देखकर हमारी भी इच्छाएं बढ़ती जाती हैं और उन्हें पूरा करने की दौड़ में हमारे जीवन में तनाव भी बढ़ता जाता है। आज के शहरी जीवन में पति-पत्नी दोनों काम करते हैं, लिहाजा उनके पास अपने ही बच्चों के लिए समय कम हो जाता है। कभी-कभार बच्चा जब भावनात्मक सहारा खोजता है और वह घर में नहीं मिलता, तो वह बाहर रिश्तों में उसे तलाश सकता है। कई बार आकर्षण को प्यार समझ लिया जाता है। कई बार रिश्ता टूटने पर गहरी चोट लगती है और नतीजतन, कुछ युवा नशे या दूसरे गलत रास्तों की ओर चले जाते हैं। यही अकेलापन और निराशा उन्हें आत्मघाती विचारों तक भी ले जा सकते हैं।
ऐसे समय में परिवार की जरूरत महसूस होती है। इसके लिए परिवार और समाज को फिर संवाद व अपनापन लौटाना होगा। मोबाइल और सोशल मीडिया का इस्तेमाल भी समयबद्ध करना जरूरी है। अगर हमारे जीवन में मन की बात कहने और सुनने वाला कोई अपना हो, तो बहुत-सी परेशानियां शुरू में ही संभाली जा सकती हैं। इसके साथ अध्यात्म जीवन को समझने की एक गहरी दृष्टि देता है। यह सवाल उठाता है- मैं कौन हूं? यह जीवन क्यों मिला है? शरीर और चेतना का संबंध क्या है? मृत्यु क्या है और उसके बाद क्या? जब मनुष्य स्वयं को केवल शरीर न मानकर अपने भीतर की चेतना को समझने लगता है, तो जीवन को देखने का नजरिया बदलता है।