Increasing Opportunities Is The Only Solution To Stop Malpractices In Exams
मौक़े बढ़ेंगे तो रुकेगी परीक्षाओं में गड़बड़ी
नवभारतटाइम्स.कॉम•
परीक्षाओं में धोखाधड़ी अपराध से पहले एक बाजार है। नौकरियों की कमी से इसकी मांग रहती है और पकड़े जाने की कम आशंका से यह जिंदा है। 2018 में उत्तर प्रदेश में ट्यूबवेल ऑपरेटर के 3,210 पदों के लिए परीक्षा होनी थी। नौकरी में न कोई बड़ा रुतबा था, न तनख्वाह बहुत ज्यादा थी। फिर भी परीक्षा से एक दिन पहले पेपर लीक हुआ और पुलिस के मुताबिक, पेपर की एक कॉपी करीब सात लाख रुपये में बिकी। एकबारगी यह भले पागलपन लगे, लेकिन यह उस नौकरी की असली कीमत दिखाती है।
मुख्य वजह । राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) विवाद ने पेपर लीक को राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बनाया, पर तस्वीर इससे कहीं ज्यादा बड़ी है। 2004 से 2026 के बीच के 110 मामलों के विश्लेषण से पता चलता है कि सिर्फ एक चौथाई मामले क्लासिक पेपर लीक के थे। बाकी में अंदरूनी मिलीभगत, मैसेजिंग ऐप्लिकेशन पर पेपर वायरल करना, डमी कैंडिडेट बिठाना, ब्लूटूथ डिवाइस और आंसर-शीट से छेड़छाड़ जैसे मामले रहे। करीब 85% फर्जीवाड़ा प्रवेश परीक्षा के लिए नहीं, सरकारी भर्तियों के लिए था। इससे पता चलता है कि मूल समस्या पेपर नहीं, बल्कि सरकारी नौकरी है। 2024 में यूपी पुलिस सिपाही के 60,244 पदों के लिए 48 लाख ने आवेदन किया। यानी एक पद पर 80 दावेदार। इसी कमी का फायदा कोचिंग माफिया और पेपर लीक करने वाले उठाते हैं।किस्मत का मोल । इसमें बड़ी भूमिका किस्मत की भी है। मान लीजिए, ग्राम सचिव भर्ती की कोई परीक्षा एक ही दिन दो बार होती है। दोनों बार के पेपर अलग हों। लिहाजा, मेरिट लिस्ट भी एक जैसी नहीं रहेगी और कटऑफ भी अलग होगी। यहां सभी ने पूरी तैयारी की और किसी ने नकल नहीं की। पर, बस सवाल बदल गए। ऐसे में किस्मत का मोल बढ़ गया।
मेहनत का रिटर्न । इसका असर उम्मीदवारों के हिसाब-किताब पर पड़ता है। कटऑफ से कुछ कम अंक लाने वाले अभ्यर्थी अगर दोबारा मेहनत करें, तो नंबर भले थोड़े बढ़ जाएं, लेकिन चांस बढ़ना मुश्किल है। वहीं, अगर पेपर पहले मिल जाए तो सिलेक्ट होना लगभग तय। मेहनत का नतीजा जितना अनिश्चित है, शॉर्टकट उतना ही कीमती। दलाल यही फर्क बेचता है। नोबेल विजेता अर्थशास्त्री गैरी बेकर के मुताबिक, अपराधी पकड़े जाने का चांस, सजा का चांस और सजा की सख्ती तौलता है।
भय ही नहीं । जिन 110 मामलों का विश्लेषण किया गया, उनमें सिर्फ 10 में सजा हुई है। इस साल सरकार ने कानून कड़ा कर 10 करोड़ रुपये तक जुर्माने और जेल का प्रावधान किया। लेकिन, जब सजा ही दुर्लभ हो, तो सख्ती कागजी हो जाती है।
लंबित मामले । कानून में दो महीने में जांच और तीन महीने में ट्रायल की मियाद तय की गई है। लेकिन, सिर्फ तारीख तय करने से फॉरेंसिक लैब और प्रॉसिक्यूटर नहीं बनते। फास्ट-ट्रैक कोर्ट में पहले ही लाखों केस लंबित हैं। जल्दबाजी में कमजोर चार्जशीट बरी होने का रास्ता भी खोल सकती है।
तीन कदम जरूरी । मेरे ख्याल से तीन कदम उठाए जाने चाहिए। सरकार को पकड़ पर निवेश बढ़ाना होगा यानी सजा बढ़ाने से ज्यादा जरूरी जांच एजेंसियों और डिजिटल फॉरेंसिक लैब को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए। साथ ही, वेंडरों के सिक्योरिटी ऑडिट पर भी निगरानी करनी चाहिए। टेंडर सबसे कम बोली पर नहीं, बल्कि डेटा और पेपर सिक्योरिटी की कड़ी जवाबदेही पर तय हों। साथ ही फिक्स्ड रिक्रूटमेंट कैलेंडर बने, जिससे हर साल तय समय पर भर्ती हो।
अवसर बढ़ाना होगा । हमें यह याद रखना चाहिए कि ट्यूबवेल ऑपरेटर के पेपर की सात लाख रुपये की कीमत किसी गिरोह की सनक नहीं, हमारे जॉब मार्केट का कड़वा सच है। यह उस गहरी खाई का सबूत है जो एक साधारण सरकारी नौकरी और बाहर की दुनिया के बीच बनी है। जब तक यह खाई रहेगी, पुल पर वसूली करने वाले दलाल खड़े रहेंगे। कानून उन्हें पकड़ सकता है, अगर क्षमता हो, लेकिन बाजार तभी सिमटेगा जब अवसरों का पुल चौड़ा होगा।
(लेखक IIT कानपुर के इकॉनमिक्स डिपार्टमेंट और वाधवानी स्कूल ऑफ AI में प्रफेसर हैं)