बसि कुसंग चाहत कुसल...

नवभारतटाइम्स.कॉम
impact of company how does a person change know from psychology and rahims couplet
‘मैं बचपन से ऐसा नहीं हूं। पहले बहुत कॉन्फिडेंट था। साहसी था। स्कूल की हर एक्टिविटी में हिस्सा लेता था। स्टेज पर परफॉर्म करता था। किसी अनजान से बात करते डरता भी नहीं था। अब पता नहीं क्या हो गया मेरे कॉन्फिडेंस को। किसी से बात करते हुए पसीना आता है। कुछ भी करता हूं, तो लगता है, पता नहीं कर भी पाऊंगा कि नहीं।’ यह आपने बहुतों से सुना होगा। या आप में से बहुतों ने किसी से कभी कहा होगा। या इसका उल्टा हुआ होगा। किसी को कहते सुना होगा कि वह पहले बहुत दब्बू, नासमझ और लो-कॉन्फिडेंस वाला था और अब ठीक उसके विपरीत बन गया है।

यह बन जाना ही वह सफर है, जो एक पहेली है। कोई इतना बदल कैसे जाता है? क्या होता है, जो उसमें यह तब्दीली लाता है। मनोविज्ञान मानता है कि हालात के साथ-साथ संगत इसकी सबसे बड़ी वजह होती है। साइकॉलजिस्ट अल्बर्ट बंडूरा की एक मशहूर थ्योरी है, ‘सोशल लर्निंग’। यह कहती है कि जिन लोगों को हम लगातार देखते-सुनते हैं, जो हमारे इर्द-गिर्द रहते हैं, जिनके व्यवहार और विचार हमारे सामने बार-बार आते हैं, वे अनजाने में हमारे लिए ‘रोल मॉडल’ बन जाते हैं। हम पहले उन्हें देखते हैं, उनके व्यवहार को समझते हैं, फिर जाने-अनजाने उसकी नकल करने लगते हैं। धीरे-धीरे वही व्यवहार हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बनने लगता है। यानी पॉजिटिव लोगों की संगत हमें पॉजिटिव और कॉन्फिडेंट बना देती है तो निगेटिव लोगों की संगत हमारा बंटाधार कर देती है।
जिन्हें यकीन नहीं, मैं उनके लिए 9वीं क्लास का एक वाकया शेयर कर रहा हूं। सरकारी स्कूल की शाम की पारी में पढ़ रहा था। क्रिकेट टीम सिलेक्ट हो गई, मुझे पता ही नहीं चला। मायूस था। किसी ने कहा, बास्केट बॉल में घुस जाओ, स्टेट भी खेल लिए तो नौकरी मिल जाएगी। पर, वह टीम मुझे खिलाती नहीं थी। मैं फिर भी रुक जाता था। उन्हें खेलते देखने के लिए। इस चक्कर में मेरा कजन अकेले घर चला जाता था। मुझे पहुंचते-पहुंचते अंधेरा होने लगता। किशोरावस्था थी। दादाजी चिंता करने लगे। एक दिन पास बिठाकर बोला, बेटा गलत संगत में तो नहीं पड़ गया है ना। मैंने कहा, नहीं बाबा जी, बास्केट बॉल के चक्कर में लेट हो जाता हूं। और आप चिंता ना करो, गलत लोगों में रहा भी, तो कभी खुद गलत नहीं बनूंगा। इस पर बाबा जी बोले- बसि कुसंग चाहत कुसल, यह रहीम अफसोस। महिमा घटी समुद्र की, रावण बस्यो पड़ोस।।

मतलब, समंदर का कोई कसूर नहीं था। रावण की सोहबत के कारण उसे भी बुरे कामों की बदनामी झेलनी पड़ी थी। अब मैं कभी यह नहीं कहता कि संगत के असर से कोई खुद को बचा सकता है। अच्छी हो या बुरी।