जवाब मिलना ही काफ़ी नहीं, प्रश्न भी महत्वपूर्ण है

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the role of a teacher in the age of ai why asking questions and developing discernment is important
आज आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (AI) कुछ ही क्षणों में किसी भी विषय पर जानकारी, व्याख्या, उदाहरण और उत्तर उपलब्ध करा सकती है। ऐसे में एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है- यदि ज्ञान और सूचना इतनी सहजता से उपलब्ध हैं, तो शिक्षक की आवश्यकता क्यों? इस प्रश्न का उत्तर शिक्षा के असली उद्देश्य में है। शिक्षा केवल सूचना प्राप्त करने का माध्यम नहीं, वह जिज्ञासा को दिशा देने, दृष्टि विकसित करने और ज्ञान को जीवन बोध में रूपांतरित करने की प्रक्रिया है। भले ही तकनीक जटिल से जटिल सवालों के उत्तर तत्काल उपलब्ध करा सकती है, लेकिन यह विवेक मनुष्य को स्वयं विकसित करना होता है कि कौन-सा प्रश्न महत्वपूर्ण है और कौन से सवाल गैरजरूरी हैं। उसे ही तय करना है कि प्राप्त उत्तर को किस संदर्भ में समझना है और उसके आधार पर क्या निर्णय लेना है। यहीं शिक्षक की भूमिका विशिष्ट हो जाती है।

चाणक्य का कथन है- ‘शिक्षक साधारण नहीं होता। प्रलय और निर्माण दोनों, उसकी गोद में खेलते हैं।’ शिक्षक का प्रभाव केवल एक विद्यार्थी के ज्ञान तक सीमित नहीं रहता, वह जिन व्यक्तित्वों को गढ़ता है, उनके विचार, निर्णय और आचरण आगे चलकर परिवार, समाज और राष्ट्र के जीवन को प्रभावित करते हैं। भारतीय परंपरा के अनेक प्रसंगों में शिक्षक की भूमिका का आकलन किया जा सकता है। नचिकेता की जिज्ञासा को यम आत्मविद्या के बोध तक ले जाते हैं। हनुमान को जामवंत उनके सामर्थ्य का स्मरण कराकर शक्ति-जागरण करते हैं। श्रीकृष्ण, अर्जुन की दृष्टि का विस्तार कर ज्ञान को निर्णय का आधार बनाते हैं। यहीं शिक्षक की भूमिका अध्यापन की सीमा से आगे जाती है।
कुम्हार की भांति शिक्षक भी शिष्य को गढ़ता है। एक हाथ भीतर से आधार देता है और दूसरा बाहर से आकार। भीतर का आधार संरक्षण, विश्वास और सामर्थ्य देता है, जबकि बाहरी स्पर्श अनुशासन, परिष्कार और दिशा प्रदान करता है। शिक्षक विद्यार्थी के ज्ञान को दृष्टि, दृष्टि को विवेक और विवेक को आचरण में रूपांतरित करता है। वह पाठ नहीं, व्यक्तित्व गढ़ता है और इसी अर्थ में शिक्षा व संस्कार का शिल्पकार है।