बस स्वाद नहीं, सभ्यता का मामला

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brics summit indias food showcase is not just taste but civilization
BRICS शिखर सम्मेलन जैसे किसी इंटरनैशनल कॉन्फ्रेंस में मेहमानों के लिए परोसा गया भोजन केवल भोजन नहीं होता, वह मेजबान देश के कल्चर, हिस्ट्री और कॉन्फिडेंस का भी प्रदर्शन होता है। इसलिए अगर भारत किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने भोजन को शो-केस करता है, तो सवाल यह होना चाहिए कि वह दुनिया को अपने फूड ट्रेडिशन के बारे में क्या बताना चाहता है।

बड़ा मामला । हाल के BRICS शिखर सम्मेलन के भारतीय मेन्यू को लेकर चर्चा इसी वजह से महत्वपूर्ण है। इसमें मुख्य रूप से भारतीय, खासकर देसी शाकाहारी परंपराओं को सामने रखा गया। कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि अगर भारत अपने भोजन की विविधता दिखाना चाहता है तो बिरयानी, कबाब, हलीम, निहारी या दूसरे लोकप्रिय मांसाहारी व्यंजन क्यों नहीं रखे गए? यह सवाल देखने में भोजन का है, लेकिन मामला उससे बड़ा है।
पहचान के प्रयास । भारत आज योग, आयुर्वेद, ध्यान, विपश्यना, बौद्ध दर्शन, शास्त्रीय संगीत, नृत्य, कला और अपनी सभ्यतागत परंपराओं को ग्लोबल पहचान देने की कोशिश कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आयुर्वेद को भी भारत ने स्वास्थ्य और वेलनेस के ग्लोबल डिस्कोर्स में स्थापित करने की कोशिश की है। बौद्ध और उपनिषद की दार्शनिक परंपराओं के माध्यम से भारत अपनी इंटेलेक्चुअल और स्पिरिचुअल हेरिटेज को दुनिया के सामने रखता है। यह सब एक योजना और लक्ष्य के साथ किया जा रहा है।

संगति जरूरी । भोजन या मेन्यू भी इसी भारतीय सॉफ्ट पावर का हिस्सा हो सकता है। योग, आयुर्वेद, ध्यान और विपश्यना के साथ जिस भोजन की संगति या सिनर्जी हो, वही शोकेस करना उचित है। वरना सब कुछ बेसुरा हो जाएगा। यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है, भारतीय भोजन का अर्थ केवल वेज नहीं है। यहां नॉन-वेज की भी बहुत पुरानी और विविध परंपराएं रही हैं। बंगाल, असम और मिथिलांचल की मछली, दक्षिण भारत का सीफूड ट्रेडिशन, तमिलनाडु, कश्मीर और पूर्वोत्तर के मांसाहारी व्यंजन भारतीय पाक-कला संस्कृति की ही अभिव्यक्तियां हैं।

विविधता का प्रदर्शन । इसलिए यदि भारत अपने भोजन को दुनिया के सामने पेश करता है, तो उसे सिर्फ यह देखना चाहिए कि क्या वह भोजन विशिष्ट रूप से भारतीय परंपरा का है। यह नहीं होना चाहिए कि ढेरों देश बिरयानी और कबाब को शोकेस कर रहे हैं और भारत ऐसा ही एक और देश बन जाए। या हम पिज्जा, बर्गर और सैंडविच को मेन्यू में रख लें। इसकी जगह बंगाल का इलिश या माछेर झोल, केरल का करीमीन पोलिचथु, गोवन फिश करी या कश्मीर के पारंपरिक मांसाहारी व्यंजन देश की विविधता को बहुत अच्छी तरह प्रदर्शित कर सकते हैं।

समावेशी स्वभाव । इसी तरह दालें, विभिन्न क्षेत्रीय सब्जियां, साग, पनीर, इडली, डोसा, ढोकला, अप्पम, बाजरे के व्यंजन और अनेक स्थानीय मिठाइयां भारत के विशाल वेज ट्रेडिशन को सामने ला सकते हैं। हमारे यहां तो सैकड़ों तरह की चटनियां और अचार हैं, जो सिर्फ भारत में ही मिलेंगे। ये हैं शोकेस करने लायक आइटम। यहां सवाल बिरयानी या कबाब को भारतीय मानने या न मानने का भी नहीं है। भारत ने सदियों से बाहर से आए प्रभावों को अपनाया है। बिरयानी की ऐतिहासिक जड़ें ईरान से जुड़ी हैं। कबाब की परंपरा पश्चिम और मध्य एशिया से जुड़ती है। कोरमा पश्चिम एशिया और खासकर तुर्की की परंपरा से आया। निहारी और हलीम जैसे व्यंजनों की भी जड़ें भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर हैं।

पहचान का सवाल । आज इनमें से कई व्यंजन भारतीय भोजन का अभिन्न हिस्सा हैं। भारतीय संस्कृति रही है कि उसने बाहर से आए प्रभावों को अपने तरीके से अपनाया और उन्हें भारतीय क्षेत्रीय रूप दिया। अक्सर कहा जाता है कि हम जिस तरह का चाइनीज खाते हैं, वह चीनी चाइनीज नहीं, भारतीय चाइनीज है। लेकिन, इंटरनैशनल कॉन्फ्रेंस के मेन्यू का उद्देश्य हर लोकप्रिय भारतीय व्यंजन की सूची बनाना नहीं होता। इसका उद्देश्य है, भारत की विशिष्ट पहचान बनाना।

हेरिटेज का चुनाव । यही अंतर 'भारत में लोकप्रिय भोजन' और 'भारत की culinary heritage' के बीच है। मेन्यू में हम हेरिटेज को चुनते हैं। इसलिए BRICS जैसे आयोजन में भारतीय शाकाहारी व्यंजनों को प्रमुखता देना अपने आप में कोई संकीर्ण या नॉन-वेज विरोधी फैसला नहीं है। मछली हो या मटन, शाकाहारी हो या मांसाहारी, सवाल एक ही होना चाहिए- क्या यह भारत की अपनी क्षेत्रीय और सभ्यतागत परंपरा को दुनिया के सामने प्रस्तुत करता है? भारत को दुनिया के सामने सिर्फ स्वाद नहीं, अपनी पहचान भी परोसनी है। अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का मेन्यू किसी देश की सभ्यता का विजिटिंग कार्ड भी होता है।

(लेखक भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय में सीनियर अडवाइजर हैं)