नीतियों संग ज़िम्मेदारी से रुकेगा प्रदूषण

नवभारतटाइम्स.कॉम
pollution control delhis air will be cleaned through policies and responsibility
सितंबर का दूसरा पखवाड़ा शुरू हो गया है। अब मौसम भी करवट लेने लगा है। अगले कुछ हफ्ते बाद देश की राजधानी की हवा एक बार फिर लोगों की सबसे बड़ी चिंता बनने वाली है। AQI के आंकड़े सुर्खियां बनने लगते हैं। सरकार-प्रशासन भी चुस्त-दुरुस्त दिखने लगता है।

सालाना स्थिति । यूं तो इस बार दिल्ली सरकार ने जुलाई से ही कवायद शुरू कर दी है, लेकिन हमारे मन में यह सवाल कौंधता है कि जब हमें पहले से मालूम है कि नवंबर आते ही दिल्ली की हवा बिगड़ने वाली है, तो असल तैयारी नवंबर में ही क्यों शुरू होती है? प्रदूषण दिल्ली के लिए कोई अचानक सामने आने वाला संकट नहीं है। बरसों से इसके कारण हमारे सामने हैं - वाहनों से निकलने वाला धुआं, सड़कों और निर्माण स्थलों की धूल, खुले में कूड़ा जलाना, औद्योगिक उत्सर्जन और आसपास के राज्यों में जलाई जाने वाली पराली। मौसम की परिस्थितियां जब इन सभी प्रदूषकों को एक साथ हवा में रोक देती हैं, तो दिल्ली की हवा सांस लेने लायक नहीं रहती।
कवायद शुरू । इस बार हालांकि स्थिति थोड़ी अलग दिख सकती है, क्योंकि दिल्ली सरकार ने हर साल सर्दियों में बढ़ने वाले प्रदूषण से निपटने के लिए 1 जुलाई को ही स्थायी विंटर पॉल्यूशन मास्टर प्लान अधिसूचित किया है। पर्यावरण एवं वन विभाग ने नई नीति के तहत प्रदूषण नियंत्रण के लिए स्थायी नियम बनाए हैं। अब ये नियम हर साल 1 नवंबर से 28 फरवरी तक स्वतः लागू हो जाएंगे। इसके लिए अलग से आदेश जारी करने की दरकार नहीं रहेगी। नए नियमों के तहत 1 नवंबर से सरकारी और निजी संस्थानों में 50% कर्मचारियों को घर से काम करने का प्रावधान भी है। सरकार का कहना है कि इससे सर्दियों में प्रदूषण बढ़ने से पहले ही रोकथाम के उपाय लागू किए जा सकेंगे।

कार्ययोजना दिखे । लेकिन, मेरे ख्याल से समाधान किसी नई नीति या किसी एक विभाग के भरोसे नहीं हो सकता। अक्टूबर-नवंबर की स्थिति को देखते हुए सितंबर से ही स्पष्ट, समयबद्ध और जिम्मेदार कार्ययोजना लागू होनी चाहिए और वह दिखनी भी चाहिए। विभागों की जिम्मेदारी, समय सीमा और परिणाम मापने का तरीका पहले तय हो। सड़कों की धूल रोकने के लिए पानी छिड़काव के बजाय टूटी सड़कें, मिट्टी वाले खुले किनारे और निर्माण मलबे जैसे मसले सुलझाना आवश्यक है। इसके अलावा, सार्वजनिक परिवहन की मुकम्मल व्यवस्था से ही निजी वाहनों पर निर्भरता घटेगी।

मासिक समीक्षा जरूरी । साथ ही, दिल्ली-एनसीआर के लिए पूरे साल की साझा योजना और मासिक समीक्षा जरूरी है। AQI 400 का इंतजार करने के बजाय सितंबर से प्रदूषण स्रोतों पर कार्रवाई होनी चाहिए। GRAP आपात उपाय है, स्थायी समाधान नहीं। नागरिकों की भी जिम्मेदारी है कि वे निजी वाहन का इस्तेमाल कम करने और नियमों का पालन करने में भूमिका निभाएं।