Lack Of Transparency In Election Commission Oppositions Doubts And Public Questions
पारदर्शिता ज़रूरी
नवभारतटाइम्स.कॉम•
कामकाज के तरीकों को लेकर चुनाव आयोग हाल के बरसों में विवादों में रहा है। विपक्ष का उस पर अविश्वास इतना गहरा शायद कभी नहीं रहा, जहां उसके तमाम फैसलों पर संदेह जताया गया। ऐसे में आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया से जुड़ा जो खुलासा हुआ है, वह गंभीर सवाल खड़े करता है। दोनों आयुक्त आयोग के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त से सहमत हुए या नहीं, इससे बड़ा मुद्दा है कि Special Intensive Revision यानी SIR जैसे संवेदनशील मसले पर उनकी आपत्तियों पर क्या हुआ।
असहमति सामान्य । चुनाव आयोग का कहना है कि उसके सदस्यों के बीच अलग राय और विचार होना बातचीत का एक सामान्य हिस्सा था और सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। आयोग का यह भी कहना है कि 10 महीने की कुछ आंतरिक टिप्पणियों को अलग करके देखने से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। चुनाव आयोग के स्ट्रक्चर को देखें तो उसके तर्क सही लगते हैं। यह कतई जरूरी नहीं है कि किसी मामले में तीनों आयुक्तों की राय एक जैसी हो। संस्थान के भीतर असहमति लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है। अलग-अलग विचार सामने आने पर ही बेहतर विकल्प का रास्ता खुलता है।निर्णय कैसे हुआ । हालांकि विभिन्न विचारों का फायदा तभी मिलता है, जब उन्हें सुना जाए। आयोग को स्पष्ट करना चाहिए कि किन असहमतियों पर विचार हुआ, किनको स्वीकार किया गया और किन पर एक राय बनाने की कोशिश हुई। यह सब इसलिए जरूरी है क्योंकि मामला SIR, मतदाताओं के नाम हटाने-जोड़ने और उस डिजिटल सिस्टम से जुड़ा है, जिस पर इलेक्टोरल रोल निर्भर है।
संदेह सही नहीं । SIR बेहद ही संवेदनशील मसला है। बिहार में इसकी शुरुआत से लेकर दिल्ली तक, कई बार इसे लेकर असंतोष जताया जा चुका है। पश्चिम बंगाल में तो विवाद जारी है। इस घटना से विपक्ष के आरोपों को बल मिलेगा और SIR को लेकर शंका बढ़ेगी, बल्कि पूर्व सीएम ममता बनर्जी ने बंगाल में दोबारा विधानसभा चुनाव कराने की मांग कर ही दी है। जब इतनी महत्वपूर्ण प्रक्रिया जारी हो, तब इतने किंतु-परंतु ठीक नहीं हैं।
जनता को पता हो । देश में स्वस्थ लोकतंत्र का सबसे जरूरी आधार चुनाव आयोग है। जनता का भरोसा उस पर तभी मजबूत होगा, जब उसे पता हो कि संस्थान के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया क्या है। इस समय CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में है। आगे इसमें क्या होता है, वह भी देखना महत्वपूर्ण होगा।