जब धीरे ढलती थी कनॉट प्लेस की शाम

नवभारतटाइम्स.कॉम•
memories of connaught place in the 1980s when evenings descended slowly and the city had a different kind of peace
सोशल मीडिया पर आजकल 1980 के दशक को याद किया जा रहा है। बहुत से लोग उस दौर के कनॉट प्लेस को भी याद कर रहे हैं। तब यह बाजार नहीं, एक एहसास था। रॉबर्ट टॉर रसेल के डिजाइन किए कनॉट प्लेस की सफेद स्तंभों वाली गोल इमारतें धूप में चमकतीं और शाम होते-होते नरम पीली रोशनी में डूब जातीं। इनर सर्किल के गलियारे खुले थे, पैदल चलने की जगह काफी थी। सेंट्रल पार्क की मखमली घास पर बैठकर आइसक्रीम खाना पसंद था दिल्ली को। वहां शतरंज की बाजियां भी लगतीं। तांगे अब कम रह गए थे, लेकिन फटफटिया रीगल तक आ जाते। भुने हुए मक्के, वेनगर्स की पेस्ट्री और मद्रास होटल की कॉफी की महक हवा में घुली रहती।

रेस्तरां से पहचान । कनॉट प्लेस उस समय दिल्ली का एकमात्र मॉल था, राजधानी का दिल और उसकी आत्मा। तब यह जगह थी सांस लेने की, तब चेहरे पहचाने जाते थे और तब शाम धीरे-धीरे ढलती थी। कनॉट प्लेस की असली जान थे रेस्तरां। यूनाइटेड कॉफी हाउस 1942 से चल रहा है। क्वालिटी 1940 से छोले-भटूरे और आइसक्रीम के लिए मशहूर है। तब निरूलास युवाओं का अड्डा था और इंडियन कॉफी हाउस तब भी सस्ता डोसा और फिल्टर कॉफी दे रहा था। आज लीडो और मिंटो ब्रिज पर ब्लू स्टार के अवशेष भी नहीं रहे। उनमें शाम को कैबरे देखने वालों की भीड़ लगती।
सिनेमा का शौक । दिल्ली उस वक्त रीगल, प्लाजा, रिवोली और ओडियन में फिल्म देखने का प्लान बनाती थी। 1932 में बना रीगल थिएटर आर्ट डेको शैली का था। सीढ़ियां चौड़ी, बक्से अलग, पंखे जोर से चलते। राज कपूर की फिल्में यहां खास तौर पर चलतीं। प्लाजा टिकट ब्लैक करने वालों की वजह से कुख्यात था। रिवोली में राजेश खन्ना की ‘आराधना’ और फिर ‘जूली’ चली थी। ओडियन तक पुरानी दिल्ली वाले तांगे आते थे।

यादों में जिंदा । कनॉट प्लेस के 1980 के दशक के बाद बहुत से लैंडमार्क खत्म हो गए हैं - सुपर बाजार, गेलॉर्ड, स्टैंडर्ड, लगूना, एल्प्स। 1984 के दंगों में सिखों की दुकानें जलीं, बाजार का चेहरा कुछ दिनों के लिए काला पड़ गया, लेकिन कनॉट प्लेस राख के ढेर से फिर उठ खड़ा हुआ। शब्दों के शैदाइयों की पसंदीदा सेंट्रल न्यूज एजेंसी भी बंद हो चुकी है। फिर भी बरामदों में अखबार, पत्रिकाएं और नॉवेल बेचने वाले मौजूद रहते हैं।

पुराना गीत । 1980 के दशक का कनॉट प्लेस धीमा, पर आत्मीय था। कॉफी की प्याली संग देर तक बातें होतीं। फिल्म के बाद बाहर निकलकर रात की हवा में सपने तैरते। जब कोई पुराना आदमी उन गलियारों में चलता है तो उसे लगता है जैसे कोई पुराना गीत बज रहा हो, जिसे अब कोई नहीं गाता।