Language Rights Not Being In The Eighth Schedule Doesnt Strip Dignity And Justice
देश में कोई भाषा अधिकारों में कमज़ोर नहीं
नवभारतटाइम्स.कॉम•
भारत की न्यायिक और संवैधानिक व्यवस्था भाषा के सवाल को दो अलग-अलग नजरियों से देखती है। अदालतें किसी भाषा को अनुसूची में शामिल करने के सवाल को नीति और विधायिका का विषय मानती हैं। वहीं, शिक्षा जैसे संदर्भों में भाषा को मौलिक अधिकारों से भी जोड़ती हैं।
संविधान की भावना । 2023 में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की गई थी। कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि यह फैसला सरकार और संबंधित संवैधानिक प्राधिकरणों के अधिकार क्षेत्र में आता है। यह रुख संविधान की मूल भावना के अनुरूप ही है। संविधान संशोधन एक विधायी प्रक्रिया है, और यह तय करना कि कौन-सी भाषा को अनुसूची में शामिल किया जाए, यह विशेषज्ञ समितियों, भाषाई आंकड़ों और व्यापक नीतिगत विचार-विमर्श का विषय है।दूसरा पहलू । राजस्थान के एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मातृभाषा आधारित शिक्षा के लिए राज्य सरकार को नीति बनाने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि अपनी भाषा में समझना और समझाना गरिमा व जीवन के अधिकार यानी अनुच्छेद 21 से जुड़ा है। राजस्थानी भाषा आज भी आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं है, फिर भी अदालत ने शिक्षा के संदर्भ में उसे अधिकार-आधारित संरक्षण दिया। स्पष्ट है कि देश की संवैधानिक व्यवस्था में भाषा से जुड़े दो अलग सिद्धांत साथ-साथ काम करते हैं।
बराबर अधिकार । इस अंतर को किसी असंगति के बजाय संविधान की एक सुविचारित संरचना के रूप में देखा जाना चाहिए। आठवीं अनुसूची में शामिल न होना किसी भाषा को अधिकार-विहीन नहीं करता। असल में यह अनुसूची कभी भाषिक अधिकारों की पूरी सूची नहीं थी। इसमें स्थान पाना मुख्य रूप से प्रतीकात्मक और प्रशासनिक लाभों से जुड़ा है - जैसे संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में भाषा का विकल्प, राजभाषा आयोग में प्रतिनिधित्व, या साहित्य अकादमी जैसी संस्थाओं से मान्यता। दूसरी ओर, अनुच्छेद 21, 29 और 350A शिक्षा, गरिमा और भाषाई अधिकारों की रक्षा करते हैं। इसके लिए अनुसूची में शामिल होना जरूरी नहीं। दूसरे शब्दों में, कानूनी तौर पर एक भाषा बिना अनुसूची में शामिल हुए भी न्यायोचित अधिकारों की हकदार हो सकती है।
बुनियादी अंतर । भाषाई आंदोलनों के लिए यह फर्क महत्वपूर्ण है। भोजपुरी, राजस्थानी या तुळु के लिए लड़ने वाले संगठन सिर्फ आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग न करें, बल्कि शिक्षा और सरकारी सेवाओं में अपनी भाषा के इस्तेमाल के अधिकार के लिए भी अदालत जा सकते हैं, जैसा राजस्थान वाले केस में हुआ। समझने वाली बात है कि आठवीं अनुसूची से बाहर होना किसी भाषा के अधिकारों या गरिमा को खत्म नहीं करता। भाषाई अधिकारों की रक्षा संविधान के मौलिक अधिकारों के तहत भी हो सकती है।