कर्नाटक सरकार का नया प्रोटोकॉल: जनप्रतिनिधियों को तिरुपति की पहली आरती में शामिल होने की मिलेगी अनुमति

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Navbharat Times
बेंगलुरु, 13 जुलाई (आईएएनएस)। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने घोषणा की है कि राज्य सरकार एक नया प्रोटोकॉल आदेश जारी करेगी, जिससे कर्नाटक के जनप्रतिनिधियों और अन्य गणमान्य व्यक्तियों को तिरुपति में होने वाली पहली आरती में शामिल होने का अवसर मिलेगा। अब तक यह विशेषाधिकार केवल मुख्यमंत्री तक सीमित था, लेकिन इस नए आदेश के तहत मंत्री, विधायक, वरिष्ठ अधिकारी, न्यायाधीश और सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले अन्य महत्वपूर्ण लोग भी इस विशेष आरती का हिस्सा बन सकेंगे। मुख्यमंत्री ने यह बात बनाशंकरी में श्री षणमुख सुब्रह्मण्य मंदिर की आधारशिला रखने के बाद कही। उन्होंने कहा कि यह कदम उन लोगों को भगवान के सामने खड़े होकर प्रार्थना करने का मौका देगा जो राज्य की सेवा करते हैं।

मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने विस्तार से बताते हुए कहा कि तिरुपति में होने वाली पहली आरती का कर्नाटक से गहरा नाता है। अब तक, प्रोटोकॉल के तहत, हर दिन कर्नाटक सरकार का एक विशेष अधिकारी ही इस आरती में शामिल हो पाता था। लेकिन अब, मुख्यमंत्री के निर्देश पर, यह सुविधा राज्य के किसी भी गणमान्य व्यक्ति के लिए खोल दी जाएगी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कई विधायक और जनप्रतिनिधि तिरुपति जाकर भी दर्शन किए बिना लौट आते थे, लेकिन अब उन्हें भगवान के सामने खड़े होकर आरती लेने का मौका मिलेगा। मुख्यमंत्री ने इसे अपने कार्यकाल की एक बड़ी घोषणा बताया, जिसका उद्देश्य राज्य की सेवा करने वालों को आध्यात्मिक लाभ पहुंचाना है।
मुख्यमंत्री ने अपनी व्यक्तिगत यात्राओं और तिरुपति से जुड़े अपने अनुभवों को भी साझा किया। उन्होंने बताया कि जेल से रिहा होने के बाद से उनके कुलदेवता को तिरुपति नहीं ले जाया गया था। अपनी हालिया यात्रा के दौरान, उन्होंने इस बारे में सोचा। उन्होंने एस. एम. कृष्णा के कार्यकाल का भी जिक्र किया, जब तिरुपति में एक कर्नाटक ट्रस्ट बनाया गया था और एक भव्य ढांचा बनाने की योजना थी। मुख्यमंत्री को उस ट्रस्ट का चेयरमैन बनाया गया था, लेकिन सरकार का कार्यकाल समाप्त होने से वह काम पूरा नहीं हो सका। उन्होंने बताया कि वहां महाराजाओं के समय से सात एकड़ का एक प्लॉट उपलब्ध था।

इस अवसर पर, मुख्यमंत्री ने द्वारकानाथ के प्रति अपने सम्मान और उनके साथ अपने लंबे जुड़ाव का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि द्वारकानाथ लंबे समय से सुब्रमण्य मंदिर बनाने की बात करते रहे हैं और उन्होंने उनसे कहा था कि सही मौका आने पर यह काम जरूर होगा। मुख्यमंत्री ने द्वारकानाथ को अपने लिए एक सम्मानित गुरु की तरह बताया और एक भविष्यवाणी का भी जिक्र किया, जिसे उन्होंने सार्वजनिक नहीं किया, लेकिन कहा कि अगर वे इसका खुलासा करें तो यह एक बड़ी खबर बन जाएगी।

मुख्यमंत्री ने गंगाधर अज्जैया के विचारों को भी साझा किया, जिन्होंने कहा था कि मानवता का धर्म दिव्य होना चाहिए और दुनिया में शांति केवल धर्म से ही आ सकती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पूजा का तरीका चाहे जो भी हो, भक्ति एक ही है, और काम चाहे जो भी हो, निष्ठा एक ही है। ईश्वर एक है, लेकिन उसके कई नाम हैं। यह विचार सभी धर्मों और विश्वासों के प्रति सम्मान व्यक्त करता है।

डी.के. शिवकुमार ने सीवी शास्त्री के माध्यम से द्वारकानाथ से अपनी पहली मुलाकात का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि जब वे पैंतीस साल के थे, तब से द्वारकानाथ उनका मार्गदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अगर वे अपने और द्वारकानाथ के बीच हुई सभी बातचीत और लेन-देन का जिक्र करें, तो इतिहास की एक पूरी किताब भर जाएगी। यह उनके गहरे और लंबे समय से चले आ रहे संबंध को दर्शाता है।

मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि द्वारकानाथ को भी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है। यहां तक कि मीडिया ने भी उन पर सवाल उठाए हैं कि क्या वे डीके शिवकुमार की तरफ से बोल रहे हैं। उन्होंने बताया कि पच्चीस सालों में द्वारकानाथ को कई बार धमकियां मिली हैं, लेकिन वे कभी उन धमकियों से नहीं डरे। यह द्वारकानाथ के साहस और दृढ़ता को उजागर करता है, जो मुख्यमंत्री के लिए प्रेरणा का स्रोत रहे हैं।