लीला चिटनिस: 1930 के दशक की ग्लैमरस नायिका से यादगार मां तक का सफर
लीला चिटनिस: 1930 के दशक की ग्लैमरस नायिका से यादगार मां तक का सफर
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नई दिल्ली, 13 जुलाई (आईएएनएस)। हिंदी सिनेमा की 1930 के दशक की जानी-मानी अदाकारा लीला चिटनिस, जिन्होंने अपनी खूबसूरती और दमदार अभिनय से दर्शकों का दिल जीता और बाद में 'मां' के किरदारों में अपनी अमिट छाप छोड़ी, का 14 जुलाई 2003 को 94 वर्ष की उम्र में अमेरिका में निधन हो गया। कर्नाटक के धारवाड़ में 9 सितंबर 1909 को जन्मी लीला ने रंगमंच से अपने अभिनय की शुरुआत की और फिर फिल्मों में आकर 'जेंटलमैन डाकू' और 'कंगन' जैसी फिल्मों से स्टारडम हासिल किया। उन्होंने अशोक कुमार के साथ कई हिट फिल्में दीं और लक्स साबुन के विज्ञापन में आने वाली पहली भारतीय फिल्म स्टार बनकर इतिहास रचा। करियर के ढलान पर उन्होंने 'मां' के किरदारों को अपनाया और 'शहीद', 'आवारा', 'गंगा जमुना' और 'गाइड' जैसी फिल्मों में यादगार भूमिकाएं निभाईं, जिससे वे हमेशा के लिए दर्शकों के दिलों में बस गईं।
लीला चिटनिस का जन्म 9 सितंबर 1909 को कर्नाटक के धारवाड़ में एक मराठी भाषी परिवार में हुआ था। उनके पिता अंग्रेजी साहित्य के प्रोफेसर थे, इसलिए घर में पढ़ाई-लिखाई का माहौल था। उस समय जब लड़कियों की पढ़ाई को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता था, लीला ने बीए की डिग्री हासिल की। उन्हें हिंदी सिनेमा की शुरुआती पढ़ी-लिखी अभिनेत्रियों में गिना जाता है। अभिनय की दुनिया में उनका सफर फिल्मों से नहीं, बल्कि रंगमंच से शुरू हुआ था। वह मराठी के प्रगतिशील नाट्य समूह 'नाट्यमन्वंतर' से जुड़ीं और कई नाटकों में मुख्य भूमिकाएं निभाईं। अभिनय के प्रति उनका जुनून धीरे-धीरे उन्हें फिल्मों की दुनिया तक ले गया।लीला की निजी जिंदगी भी काफी उतार-चढ़ाव भरी रही। कम उम्र में ही उनकी शादी डॉ. गजानन यशवंत चिटनिस से हो गई थी। वह चार बच्चों की मां बनीं, लेकिन उनका वैवाहिक जीवन ज्यादा समय तक नहीं चल पाया। पति से अलग होने के बाद बच्चों की पूरी जिम्मेदारी लीला पर आ गई। परिवार का खर्च चलाने के लिए उन्होंने स्कूल में अध्यापिका की नौकरी की और साथ ही रंगमंच से भी जुड़ी रहीं।
फिल्मों में उनका शुरुआती सफर आसान नहीं था। उन्होंने छोटे किरदारों और एक्स्ट्रा कलाकार के रूप में काम करना शुरू किया। इसके बाद उन्हें स्टंट फिल्मों में भी मौके मिले। साल 1937 में आई फिल्म 'जेंटलमैन डाकू' ने उनके करियर को एक नई दिशा दी। इस फिल्म में उन्होंने पुरुषों के कपड़े पहनकर एक अलग तरह का किरदार निभाया था, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा। इसके बाद लीला चिटनिस की प्रतिभा पर फिल्म इंडस्ट्री की नजर पड़ी।
उन्हें बॉम्बे टॉकीज से जुड़ने का मौका मिला और साल 1939 में आई फिल्म 'कंगन' ने उन्हें एक बड़ा स्टार बना दिया। इस फिल्म में उन्होंने अशोक कुमार के साथ मुख्य भूमिका निभाई थी। फिल्म की सफलता के साथ ही अशोक कुमार और लीला चिटनिस की जोड़ी भी दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हो गई। 'कंगन' के बाद लीला ने अशोक कुमार के साथ 'बंधन', 'आजाद' और 'झूला' जैसी कई सफल फिल्मों में काम किया। अशोक कुमार उनकी अभिनय क्षमता से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने कहा था कि बिना बोले सिर्फ आंखों से भाव व्यक्त करना उन्होंने लीला चिटनिस से सीखा था।
अपने करियर के सुनहरे दौर में लीला चिटनिस ने एक और इतिहास रचा। साल 1941 में वह लोकप्रिय साबुन ब्रांड लक्स के विज्ञापन में नजर आईं और ऐसा करने वाली पहली भारतीय फिल्म स्टार बनीं। उस समय इस तरह के विज्ञापन में केवल हॉलीवुड की बड़ी अभिनेत्रियां ही दिखाई देती थीं। यह उनके लिए एक बड़ी उपलब्धि थी, जिसने भारतीय अभिनेत्रियों के लिए नए रास्ते खोले।
समय के साथ फिल्मों में नई अभिनेत्रियों का दौर आया और लीला ने अपने करियर की दिशा बदल ली। साल 1948 में आई फिल्म 'शहीद' में उन्होंने पहली बार मां का ऐसा किरदार निभाया, जिसने उनकी पहचान हमेशा के लिए बदल दी। इसके बाद वह हिंदी फिल्मों की सबसे यादगार मांओं में शामिल हो गईं। लीला चिटनिस ने दिलीप कुमार, राज कपूर और कई बड़े सितारों की मां की भूमिका निभाई। 'आवारा', 'गंगा जमुना' और 'गाइड' जैसी फिल्मों में उनके निभाए गए मां के किरदारों को खूब सराहा गया। उन्होंने पर्दे पर त्याग, ममता और संघर्ष से भरी मां की ऐसी छवि बनाई, जिसे बाद की कई अभिनेत्रियों ने आगे बढ़ाया।
1985 में आई फिल्म 'दिल तुझको दिया' उनकी आखिरी फिल्म रही। इसके बाद वह अमेरिका चली गईं और अपने बच्चों के साथ रहने लगीं। 14 जुलाई 2003 को 94 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। लीला चिटनिस का अभिनय सफर, उनकी निजी जिंदगी के संघर्ष और 'मां' के रूप में उनकी अमिट छाप उन्हें हमेशा हिंदी सिनेमा के इतिहास में याद दिलाएगी।