एचआईवी महामारी का खतरा बढ़ा: यूएनएड्स की रिपोर्ट में वित्तीय सहायता में गिरावट का खुलासा
एचआईवी महामारी का खतरा बढ़ा: यूएनएड्स की रिपोर्ट में वित्तीय सहायता में गिरावट का खुलासा
NewsPoint•
ब्रासीलिया/जिनेवा, 28 जुलाई: संयुक्त राष्ट्र की एचआईवी/एड्स से लड़ने वाली एजेंसी यूएनएड्स ने एक चौंकाने वाली रिपोर्ट जारी की है, जो दुनिया को खतरे की घंटी बजा रही है। रिपोर्ट के अनुसार, एचआईवी से लड़ने के लिए मिलने वाली वित्तीय सहायता में भारी कमी आई है। इस कमी से एचआईवी महामारी के फिर से फैलने का खतरा बढ़ गया है। यूएनएड्स ने सोमवार को अपनी 60 पन्नों की रिपोर्ट में कहा कि अगर दुनिया ने तुरंत मिलकर सहयोग नहीं बढ़ाया, तो पिछले कई दशकों में एचआईवी के खिलाफ जो भी सफलता मिली है, वह सब बेकार हो जाएगी।
रिपोर्ट में बताया गया है कि साल 2025 में एचआईवी की रोकथाम के लिए मिलने वाली अंतरराष्ट्रीय फंडिंग 18 प्रतिशत घटकर सिर्फ 7.3 अरब डॉलर रह गई है। यह पिछले लगभग 20 सालों में सबसे कम स्तर है। इस पैसे की कमी से एचआईवी के नए संक्रमणों और एड्स से होने वाली मौतों में जो कमी आ रही थी, वह रुक सकती है या पलट सकती है। यूएनएड्स ने यह भी बताया कि जनवरी 2025 में जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व्हाइट हाउस लौटे, तो अमेरिका ने एचआईवी से जुड़े सभी कार्यक्रमों के लिए फंडिंग पर रोक लगा दी थी। हालांकि, कुछ दिनों बाद जान बचाने वाले इलाज के लिए पैसे फिर से मिलने लगे, लेकिन ज्यादातर प्रोजेक्ट्स के लिए फंडिंग बहुत कम कर दी गई। इससे पहले, अमेरिका ही एचआईवी के लिए मिलने वाले कुल अंतरराष्ट्रीय फंड का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा देता था।रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया इस समय राजनीतिक और आर्थिक रूप से अस्थिर है। इस वजह से एचआईवी के खिलाफ सालों की मेहनत से मिली सफलताएं खतरे में पड़ गई हैं। यूएनएड्स ने फिर से दोहराया कि साल 2030 तक एड्स को खत्म करने का जो वैश्विक लक्ष्य रखा गया था, वह अब पूरा होता नहीं दिख रहा है। पैसों की कमी के अलावा, इबोला जैसी स्वास्थ्य आपदाओं ने भी इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों को नुकसान पहुंचाया है।
पिछले साल दुनिया भर में करीब 12 लाख लोग एचआईवी से संक्रमित हुए। कुछ देशों ने अपने घरेलू स्वास्थ्य बजट को बढ़ाकर विदेशी सहायता में हुई कमी की थोड़ी भरपाई करने की कोशिश की। इसके बावजूद, एचआईवी से जुड़े कुल संसाधनों में 6 प्रतिशत की गिरावट आई है। लेकिन, सभी देश ऐसा नहीं कर पाए। खासकर उप-सहारा अफ्रीका में, जहां दुनिया के लगभग आधे नए एचआईवी संक्रमण होते हैं। कैमरून, नाइजीरिया और जाम्बिया जैसे देशों के आंकड़ों के अनुसार, एचआईवी संक्रमण से बचाव के लिए दी जाने वाली प्री-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (पीआरईपी) दवा लेने वाले लोगों की संख्या 50 प्रतिशत से भी ज्यादा कम हो गई है। पीआरईपी एक ऐसी दवा है जिसे एचआईवी होने का खतरा ज्यादा होने पर लिया जाता है, ताकि संक्रमण से बचा जा सके।
यूएनएड्स ने बताया कि फंडिंग में आई इस रुकावट का सबसे ज्यादा असर एचआईवी की रोकथाम, जांच और समुदाय-आधारित स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ा है। ये सेवाएं उन लोगों तक पहुंचने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, जिन्हें एचआईवी होने का सबसे ज्यादा खतरा होता है। जब इन सेवाओं के लिए पैसा कम हो जाता है, तो सबसे ज्यादा जोखिम वाले लोगों तक मदद नहीं पहुंच पाती। इससे एचआईवी के फैलने का खतरा और बढ़ जाता है। यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि एचआईवी से लड़ने के लिए लगातार और पर्याप्त फंडिंग की जरूरत होती है। अगर यह फंडिंग रुक जाती है, तो पिछले सालों की सारी मेहनत बेकार हो सकती है और लाखों लोग फिर से खतरे में पड़ सकते हैं।