सुरेश रैना ने बताया कैसे भारतीय टीम की फील्डिंग का स्तर बदला, अनुशासन और कड़ी तैयारी का महत्व
सुरेश रैना ने बताया कैसे भारतीय टीम की फील्डिंग का स्तर बदला, अनुशासन और कड़ी तैयारी का महत्व
NewsPoint•
नई दिल्ली, 28 जुलाई। भारतीय क्रिकेट के दिग्गज खिलाड़ी सुरेश रैना ने अपने सुनहरे दिनों को याद करते हुए बताया कि कैसे अनुशासन और कड़ी मेहनत ने भारतीय टीम की फील्डिंग का स्तर पूरी तरह बदल दिया था। रैना ने कहा कि लगातार अभ्यास की संस्कृति ने ही भारत को दुनिया की सबसे बेहतरीन फील्डिंग इकाइयों में से एक बनने में मदद की। उन्होंने अपने शुरुआती दिनों की तैयारियों, सीनियर खिलाड़ियों के प्रभाव और ऑस्ट्रेलिया में हुए एक यादगार ऑन-फील्ड टकराव को याद करते हुए बताया कि कैसे कड़ी मेहनत, आदर्श खिलाड़ियों और सीख ने उनके फील्डिंग करियर को आकार दिया और उन्हें भारत के सबसे भरोसेमंद फील्डरों में से एक बनाया।
रैना ने जियोस्टार से बात करते हुए कहा, “हमने फील्डिंग की एक संस्कृति बनाई थी। सभी खिलाड़ी आधा घंटा पहले मैदान पर पहुंच जाते थे क्योंकि हमारी ट्रेनिंग की शुरुआत हमेशा फील्डिंग से होती थी। आज की तरह नहीं कि कुछ कैच पकड़ लिए और फील्डिंग सत्र खत्म हो गया। उस समय हम अलग-अलग हाई कैच, ग्राउंड फील्डिंग, स्लिप कैच और पैरेलल कैच का अभ्यास करते थे। बीच में एक स्टंप लगाया जाता था। कैफ भाई उत्तर प्रदेश के कप्तान थे, वह कहते थे, ‘अगर सीधे स्टंप पर थ्रो नहीं मारोगे, तो प्लेइंग इलेवन में जगह नहीं मिलेगी।’ इन्हीं कठिन अभ्यास सत्रों ने उनकी फील्डिंग को मजबूत आधार दिया।”उन्होंने आगे बताया कि जोंटी रोड्स जैसे महान फील्डर से तारीफ मिलना हमेशा खास होता था। रैना ने कहा, “वह हमेशा हमारे आदर्श रहे हैं। उत्तर प्रदेश में मैंने मोहम्मद कैफ भाई से बहुत कुछ सीखा। वहीं भारतीय टीम में युवराज सिंह से भी काफी प्रेरणा मिली। वह पॉइंट और कवर पर फील्डिंग करते थे, जबकि मैं मिड-ऑफ पर रहता था। हमने इंडिया के लिए जितने भी मैच साथ खेले, कोशिश यही रहती थी कि गेंद हमारे बीच से न निकल पाए।”
बाएं हाथ के पूर्व बल्लेबाज ने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर की एक ऐसी घटना को याद किया जो ऑस्ट्रेलिया दौरे पर इरफान पठान के साथ हुई थी। रैना ने बताया, “मुझे ऑस्ट्रेलिया दौरे का सिडनी वनडे याद है। जडेजा गेंदबाजी कर रहे थे और डेविड वॉर्नर ने स्वीप शॉट खेला, जिसमें टॉप एज लग गया। मैं मिडविकेट पर था और इरफान भाई फाइन लेग से दौड़ रहे थे। मैं सिर्फ गेंद को देख रहा था। मुझे बिल्कुल नहीं पता था कि इरफान भाई कहां हैं। मुझे सिर्फ गेंद, फ्लडलाइट्स, दर्शक और पीछे लहराता तिरंगा दिखाई दे रहा था। जैसे ही मैंने कैच पूरा किया, मेरी टक्कर इरफान भाई से हो गई।”
उन्होंने उस पल को याद करते हुए कहा, “एक पल के लिए मुझे लगा कि अगर मेरा सिर उनके शरीर से टकरा जाता, तो या तो उन्हें गंभीर चोट लगती या मुझे। शुक्र है कि सिर्फ मेरा कंधा उनसे टकराया और मैं कैच पकड़ने में सफल रहा। लेकिन इरफान भाई की पसली में फ्रैक्चर हो गया था। उन्हें काफी चोट आई थी। उसी घटना से हमने एक बड़ी सीख ली कि जिसका कैच हो, उसे जोर से आवाज लगाकर बताना चाहिए।”
रैना ने कहा कि इस घटना ने फील्डरों के बीच बेहतर संवाद की अहमियत को हमेशा के लिए उनके मन में बिठा दिया। उन्होंने बताया कि शुरुआती वर्षों में मिले कठिन प्रशिक्षण, अनुभवी साथियों से मिली सीख और मैदान पर हुए ऐसे अनुभवों ने ही उन्हें एक ऐसा फील्डर बनाया, जिसकी फुर्ती, पूर्वानुमान क्षमता और समर्पण की लंबे समय तक प्रशंसा होती रही।
रैना ने बताया कि फील्डिंग को लेकर उनकी टीम का रवैया बहुत गंभीर था। वे सिर्फ कैच पकड़ने तक ही सीमित नहीं रहते थे, बल्कि हर तरह की फील्डिंग का बारीकी से अभ्यास करते थे। यह सिर्फ एक खेल नहीं था, बल्कि एक जुनून था। हर खिलाड़ी मैदान पर अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए तैयार रहता था। यह अनुशासन और समर्पण ही था जिसने भारतीय फील्डिंग को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया।
उन्होंने यह भी बताया कि कैसे सीनियर खिलाड़ियों ने युवा खिलाड़ियों को प्रेरित किया। मोहम्मद कैफ और युवराज सिंह जैसे खिलाड़ियों के साथ खेलने से उन्हें बहुत कुछ सीखने को मिला। वे न केवल मैदान पर बल्कि मैदान के बाहर भी एक मिसाल थे। उनकी मेहनत और खेल के प्रति लगन ने रैना जैसे युवा खिलाड़ियों को बेहतर प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित किया।
ऑस्ट्रेलिया में हुई वह टक्कर वाली घटना रैना के लिए एक महत्वपूर्ण सबक थी। यह सिर्फ एक कैच पकड़ने की बात नहीं थी, बल्कि टीम के साथियों के साथ तालमेल और संवाद की भी बात थी। इस घटना ने उन्हें सिखाया कि मैदान पर हर पल सतर्क रहना कितना जरूरी है और अपने साथियों के साथ मिलकर कैसे काम करना है।
रैना ने इस बात पर जोर दिया कि आज की युवा पीढ़ी को भी इसी तरह की मेहनत और समर्पण दिखाना चाहिए। सिर्फ प्रतिभा काफी नहीं है, बल्कि कड़ी मेहनत और अनुशासन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि अगर वे आज भी भारतीय टीम की फील्डिंग को इतना मजबूत देखते हैं, तो उन्हें अपने दिनों की मेहनत का फल मिलता हुआ महसूस होता है।
उन्होंने यह भी बताया कि कैसे उन्होंने जोंटी रोड्स जैसे महान फील्डर से प्रेरणा ली। जोंटी रोड्स की फील्डिंग का तरीका हमेशा से ही लाजवाब रहा है और रैना ने उनसे बहुत कुछ सीखा। यह सीखना सिर्फ तकनीक का नहीं था, बल्कि खेल के प्रति उनके जुनून और समर्पण का भी था।
कुल मिलाकर, सुरेश रैना की यह बातें हमें सिखाती हैं कि किसी भी क्षेत्र में सफलता पाने के लिए कड़ी मेहनत, अनुशासन, सही मार्गदर्शन और टीम वर्क कितना जरूरी है। उनकी यादें हमें प्रेरित करती हैं कि हम भी अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए इसी तरह का समर्पण दिखाएं।