गुजरात सरकार ने कलेक्टरों की वित्तीय शक्तियां बढ़ाईं, भूमि आवंटन में तेजी
गुजरात सरकार ने कलेक्टरों की वित्तीय शक्तियां बढ़ाईं, भूमि आवंटन में तेजी
NewsPoint•
गांधीनगर, 28 जुलाई। गुजरात सरकार ने मंगलवार को जिला कलेक्टरों और जिला विकास अधिकारियों (डीडीओ) की वित्तीय शक्तियों में ज़बरदस्त बढ़ोतरी कर दी है। अब वे जिला स्तर पर सरकारी ज़मीन आवंटन से जुड़े ज़्यादातर मामलों को खुद ही मंज़ूरी दे सकेंगे। सरकार का कहना है कि इस बड़े कदम से सरकारी कामकाज में तेज़ी आएगी और ज़मीन आवंटन की प्रक्रिया आसान हो जाएगी। इससे पूरे राज्य में बुनियादी ढांचा, उद्योग, ग्रामीण विकास और जनकल्याण से जुड़ी परियोजनाओं को तेज़ी से लागू करने में मदद मिलेगी।
इस अहम फैसले की जानकारी देते हुए मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने कहा, “वित्तीय शक्तियों में यह वृद्धि राज्य सरकार के ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को बेहतर बनाने और मामलों को गांधीनगर भेजने की आवश्यकता कम करके प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बनाने के निरंतर प्रयासों का हिस्सा है।” उन्होंने आगे बताया कि इस बदलाव से ज़मीन आवंटन के ज़्यादातर फैसले ज़िला स्तर पर ही हो जाएंगे, जिससे लोगों को बार-बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।नई व्यवस्था के तहत, जिला कलेक्टरों को अब राज्य सरकार के बोर्डों और निगमों, केंद्र सरकार के विभागों, आवासीय ज़रूरतों, सहकारी हाउसिंग सोसाइटियों, नीलामी के ज़रिए व्यावसायिक इस्तेमाल और सहकारी गोदामों व अन्य संस्थानों के लिए सरकारी ज़मीन आवंटित करने की वित्तीय सीमा में काफी इज़ाफ़ा किया गया है। पहले जहां राज्य सरकार के बोर्डों और निगमों को दो हेक्टेयर तक ज़मीन आवंटित करने की सीमा सिर्फ़ 15 लाख रुपये थी, उसे बढ़ाकर अब 1 करोड़ रुपये कर दिया गया है। इसी तरह, सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए केंद्र सरकार के विभागों को एक हेक्टेयर तक ज़मीन आवंटित करने की सीमा 15 लाख रुपये से बढ़ाकर 50 लाख रुपये कर दी गई है।
आम लोगों के लिए भी अच्छी खबर है। सरकारी कर्मचारियों और अन्य व्यक्तियों को घर बनाने के लिए ज़मीन आवंटन की सीमा 1 लाख रुपये से बढ़ाकर 20 लाख रुपये कर दी गई है। वहीं, सहकारी हाउसिंग सोसाइटियों के लिए यह सीमा 6 लाख रुपये से बढ़ाकर 50 लाख रुपये कर दी गई है। व्यापारिक गतिविधियों के लिए, नीलामी के ज़रिए ज़मीन आवंटन की वित्तीय सीमा 1 लाख रुपये से बढ़ाकर 5 लाख रुपये कर दी गई है। सहकारी गोदामों और अन्य संस्थानों के लिए यह सीमा 3 लाख रुपये से बढ़ाकर 15 लाख रुपये कर दी गई है।
सिर्फ़ जिला कलेक्टर ही नहीं, बल्कि जिला विकास अधिकारियों (डीडीओ) की भी वित्तीय शक्तियों को बढ़ाया गया है। अब वे गामताल (गांव की आबादी वाले इलाके) के भूखंडों के आवंटन से जुड़े ज़्यादातर मामलों को खुद ही निपटा सकेंगे। व्यक्तिगत घर बनाने के लिए भूखंडों के आवंटन की सीमा 20,000 रुपये से बढ़ाकर 1 लाख रुपये कर दी गई है। सहकारी हाउसिंग सोसाइटियों के लिए यह सीमा 1.5 लाख रुपये से बढ़ाकर 7.5 लाख रुपये कर दी गई है। दुग्ध सहकारी समितियों, सहकारी गोदामों और ग्रामीण ग्रिड परियोजनाओं के लिए भी यह सीमा 20,000 रुपये से बढ़ाकर 1 लाख रुपये कर दी गई है।
सरकार का मानना है कि इन बढ़ी हुई वित्तीय शक्तियों से ज़िला स्तर पर ही ज़्यादातर मामलों का निपटारा हो जाएगा। ऐसा इसलिए संभव होगा क्योंकि ज़मीन से जुड़े रिकॉर्ड और ज़मीनी हकीकत की जानकारी ज़िला स्तर पर पहले से ही उपलब्ध होती है। इससे सरकारी कामकाज में होने वाली देरी कम होगी और मंज़ूरी की प्रक्रिया काफी आसान हो जाएगी। अधिकारियों ने बताया कि इन बदलावों से सार्वजनिक बुनियादी ढांचे, औद्योगिक विकास और सामाजिक क्षेत्र की परियोजनाओं के लिए सरकारी ज़मीन का आवंटन तेज़ी से हो सकेगा। साथ ही, इससे रोज़गार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
सरकार को यह भी उम्मीद है कि सरकारी ज़मीन के कब्ज़े का शुल्क या प्रीमियम जल्दी वसूल होने से राज्य के खजाने में भी तेज़ी से पैसा जमा होगा। इस पूरे फैसले का एक और बड़ा मकसद यह है कि ज़मीन आवंटन के लिए आवेदन करने वाले लोगों, संस्थाओं और सरकारी विभागों को बार-बार गांधीनगर के चक्कर न लगाने पड़ें। इससे संबंधित सभी प्रक्रियाएं ज़िला स्तर पर ही पूरी हो जाएंगी, जिससे उनका समय और पैसा दोनों बचेगा।
एक और अहम बदलाव यह किया गया है कि अब जिला कलेक्टरों को यह अधिकार दिया गया है कि अगर राज्य सरकार के बोर्डों, निगमों या केंद्र सरकार के विभागों को ज़मीन आवंटित करने के मामलों में मांग पत्र जारी होने के 90 दिनों के भीतर कब्ज़े का मूल्य या प्रीमियम का भुगतान नहीं किया जाता है, तो वे भुगतान की समय-सीमा बढ़ा सकेंगे। यह समय-सीमा जिला भूमि मूल्यांकन समिति के तीन साल के कार्यकाल की समाप्ति तक बढ़ाई जा सकेगी। सरकार का कहना है कि इस बदलाव से बार-बार होने वाली प्रशासनिक प्रक्रियाओं में कमी आएगी और काम सुचारू रूप से चलता रहेगा। कुल मिलाकर, यह फैसला गुजरात में ज़मीन आवंटन की प्रक्रिया को सरल, तेज़ और ज़्यादा पारदर्शी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।