हॉर्मुज स्ट्रेट बंद होने पर भी भारत के ऊर्जा क्षेत्र की मजबूती, ईंधन आपूर्ति यथावत रही

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Navbharat Times
नई दिल्ली, 29 जून। विशेषज्ञों ने सोमवार को बताया कि हॉर्मुज स्ट्रेट के करीब चार महीने तक बंद रहने के बावजूद भारत में ईंधन की आपूर्ति सामान्य बनी रही और ग्राहकों पर इसका असर बहुत कम हुआ। यह देश के ऊर्जा क्षेत्र की मजबूती को दर्शाता है, जो इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश, अलग-अलग जगहों से आपूर्ति और सरकारी फैसलों में तालमेल का नतीजा है।

इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड के पूर्व चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर (एमडी) वर्तिका शुक्ला ने समाचार एजेंसी से बात करते हुए कहा कि हॉर्मुज स्ट्रेट में आई दिक्कतों ने भारत के ऊर्जा क्षेत्र की ताकत को दिखाया है। इस दौरान भारत की आपूर्ति स्थिर रही और सप्लाई चेन में आई रुकावटों का आम लोगों के लिए पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर बहुत कम असर पड़ा। इसकी मुख्य वजह सरकार का समय पर सप्लाई के स्रोतों को बदलना और एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर में काफी निवेश करना था।
हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) के पूर्व चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर एम.के. सुराना ने बताया कि जब पश्चिम एशिया में लड़ाई शुरू हुई और हॉर्मुज स्ट्रेट से जहाजों का आना-जाना मुश्किल हो गया, तो कई जानकारों को लगा था कि भारत को ईंधन की भारी कमी का सामना करना पड़ेगा। ऐसा इसलिए था क्योंकि भारत आयातित कच्चे तेल पर बहुत ज्यादा निर्भर है।

सुराना ने कहा, “जब टकराव शुरू हुआ और हॉर्मुज स्ट्रेट बंद हो गया, तो ज्यादातर जानकारों को लगा था कि 85 प्रतिशत आयातित कच्चे तेल पर निर्भर भारत की आपूर्ति ठप हो जाएगी और देश में पेट्रोल की कमी हो जाएगी।” उन्होंने आगे कहा, “एलपीजी भी नहीं मिल पाती। भारी कमी हो जाती और बड़े पैमाने पर कामकाज बंद हो जाता।”

उन्होंने हैरानी जताते हुए कहा कि दुनिया भर के कई देशों को ईंधन की कमी से निपटने के लिए ऑड-ईवन फ्यूल राशनिंग (एक दिन सम नंबर की गाड़ी, दूसरे दिन विषम नंबर की गाड़ी चलाना), घर से काम करने का आदेश और शाम 5 बजे पेट्रोल पंप बंद करने जैसे आपातकालीन उपाय अपनाने पड़े। लेकिन भारत के नागरिकों को ऐसे किसी भी आपातकालीन उपाय का सामना नहीं करना पड़ा।

सुराना ने इस मजबूती का श्रेय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय, सरकारी तेल कंपनियों और विभिन्न सरकारी एजेंसियों के मिले-जुले प्रयासों को दिया। उन्होंने बताया कि रुकावटों के बावजूद, देश ने घरेलू खपत को प्राथमिकता देते हुए, सप्लाई और मांग दोनों तरफ के उपायों को अपनाकर बिना किसी रुकावट के घरेलू कुकिंग गैस की आपूर्ति बनाए रखने में सफलता हासिल की।

सुराना के अनुसार, सरकार की कच्चे तेल के आयात में विविधता लाने और 40 से ज्यादा देशों से आपूर्ति हासिल करने की रणनीति ने हॉर्मुज में आई रुकावट के असर को कम करने और भारत की लंबे समय की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई। इसका मतलब है कि भारत ने सिर्फ एक या दो देशों पर निर्भर रहने के बजाय, दुनिया के कई देशों से तेल खरीदा, जिससे किसी एक जगह पर समस्या आने पर भी सप्लाई बनी रही।

यह दिखाता है कि भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश का मतलब है कि तेल को स्टोर करने और देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत की गई है। अलग-अलग स्रोतों से तेल खरीदने से यह सुनिश्चित हुआ कि अगर किसी एक देश से तेल मिलना बंद हो जाए, तो दूसरे देशों से उसकी भरपाई की जा सके। सरकारी फैसलों में तालमेल का मतलब है कि सभी संबंधित मंत्रालय और एजेंसियां मिलकर काम कर रही थीं, जिससे किसी भी मुश्किल का सामना प्रभावी ढंग से किया जा सके।

यह सब मिलकर यह सुनिश्चित करता है कि भारत जैसे बड़े देश को ऊर्जा की कमी का सामना न करना पड़े, भले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई भी संकट आ जाए। यह भारत की आर्थिक स्थिरता और नागरिकों के जीवन को सुचारू बनाए रखने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।