कैप्टन विक्रम बत्रा: कारगिल के शेर, परमवीर चक्र विजेता की जयंती पर विशेष

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Navbharat Times
नई दिल्ली, 8 सितंबर। 1999 के कारगिल युद्ध में कैप्टन विक्रम बत्रा के अदम्य साहस ने पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। 9 सितंबर 1974 को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में जन्मे कैप्टन बत्रा, कारगिल युद्ध के उन नायकों में से एक थे, जिनका शौर्य, हौसला और जज्बा आज भी देशवासियों को प्रेरित करता है। गिरधारी लाल बत्रा और कमल कांता बत्रा के घर जन्मे विक्रम और उनके जुड़वां भाई विशाल को प्यार से 'लव-कुश' नाम दिया गया था। बचपन से ही दोनों भाई पढ़ाई और खेलकूद में अव्वल थे, लेकिन विक्रम का निडर स्वभाव उन्हें सबसे अलग बनाता था। 'परमवीर चक्र' सीरियल देखकर वे अक्सर वीरता की कहानियों पर चर्चा करते थे। विक्रम एक बेहतरीन टेबल टेनिस खिलाड़ी होने के साथ-साथ पढ़ाई में भी हमेशा अव्वल रहते थे। कॉलेज में एनसीसी कैडेट के तौर पर उन्होंने नॉर्थ जोन में 'बेस्ट कैडेट' का खिताब जीता। मर्चेंट नेवी की अच्छी नौकरी का प्रस्ताव ठुकराकर उन्होंने सेना की वर्दी पहनने का सपना चुना। 1996 में देहरादून की भारतीय सैन्य अकादमी से प्रशिक्षण पूरा करने के बाद, विक्रम बत्रा को 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्ति मिली।

1999 में जब पाकिस्तान ने कारगिल की चोटियों पर अवैध कब्जा कर लिया, तो भारतीय सेना ने 'ऑपरेशन विजय' शुरू किया। इसी दौरान कैप्टन विक्रम बत्रा ने अपना शौर्य दिखाया। सबसे पहले उन्हें प्वाइंट 5140 पर कब्जा करने की जिम्मेदारी मिली। यह दुश्मनों की एक मजबूत चौकी थी, जिस पर जीत हासिल करना लगभग असंभव माना जा रहा था। लेकिन उस समय विक्रम ने अपने साथियों से कहा था, "या तो तिरंगा लहराकर आऊंगा या तिरंगे में लिपटकर… लेकिन आऊंगा जरूर।" दुश्मनों की मशीन गन की गोलियों की बौछार के बीच, उन्होंने अपने सैनिकों के साथ खड़ी चट्टान पर चढ़ाई की। ग्रेनेड फेंककर दुश्मनों की चौकी को ध्वस्त कर दिया और हाथ से हाथ की लड़ाई में तीन पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया। इस दौरान वे घायल भी हुए, लेकिन मिशन पूरा होने तक मोर्चे पर डटे रहे। 20 जून 1999 की तड़के, 17 हजार फीट की ऊंचाई पर जब प्वाइंट 5140 फतह हुआ, तो रेडियो पर उनकी आवाज गूंजी, "ये दिल मांगे मोर!" यह नारा सिर्फ पेप्सी का विज्ञापन नहीं रहा, बल्कि पूरे देश का जज्बा बन गया।
इसके बाद कैप्टन बत्रा और उनकी बटालियन ने प्वाइंट 5100, 4700, जंक्शन पीक और 'थ्री पिम्पल्स' जैसे दुर्गम मोर्चों पर भी जीत हासिल की। उनकी बहादुरी का खौफ पाकिस्तानी सेना में फैल चुका था, इसीलिए दुश्मन भी उन्हें 'शेरशाह' कहते थे। 6 जुलाई 1999 को उन्हें प्वाइंट 4875 पर कब्जा करने का आदेश मिला। यह जगह आज 'बत्रा टॉप' के नाम से जानी जाती है। सुबह होते-होते उन्होंने मोर्चा संभाल लिया। तभी उनके एक साथी अधिकारी कैप्टन नवीन नागप्पा गंभीर रूप से घायल हो गए। विक्रम ने उन्हें खुद सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया। जब एक जवान को गोली लगी, तो उसे बचाने के लिए विक्रम दुश्मन की गोलियों की बौछार में कूद पड़े। इसी दौरान एक स्नाइपर की गोली उनके सीने में लगी। अपनी आखिरी सांस लेते हुए उन्होंने अपने रेजिमेंट का जयकारा लगाया - 'जय माता दी।' 7 जुलाई 1999 को देश ने अपने इस वीर सपूत को खो दिया, लेकिन उनके बलिदान ने प्वाइंट 4875 पर तिरंगा लहरा दिया।

कैप्टन विक्रम बत्रा की असाधारण वीरता और नेतृत्व को देखते हुए, उन्हें मरणोपरांत 15 अगस्त 1999 को भारत का सर्वोच्च वीरता सम्मान 'परमवीर चक्र' प्रदान किया गया। उनका जन्म 9 सितंबर 1974 को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में हुआ था। उनके पिता गिरधारी लाल बत्रा और माता कमल कांता बत्रा ने उन्हें और उनके जुड़वां भाई विशाल को 'लव-कुश' नाम दिया था। बचपन से ही विक्रम का निडर स्वभाव उन्हें खास बनाता था। वे अक्सर टीवी पर 'परमवीर चक्र' सीरियल देखकर वीरता की कहानियों पर चर्चा करते थे। टेबल टेनिस के अच्छे खिलाड़ी होने के साथ-साथ वे पढ़ाई में भी हमेशा अव्वल रहते थे। कॉलेज में एनसीसी कैडेट के तौर पर उन्होंने नॉर्थ जोन में 'बेस्ट कैडेट' का खिताब जीता था। मर्चेंट नेवी की अच्छी नौकरी का प्रस्ताव ठुकराकर उन्होंने सेना की वर्दी पहनने का सपना पूरा किया। 1996 में देहरादून की भारतीय सैन्य अकादमी से प्रशिक्षण पूरा करने के बाद, उन्हें 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्ति मिली।

1999 में जब पाकिस्तान ने कारगिल की चोटियों पर कब्जा कर लिया, तो भारतीय सेना ने 'ऑपरेशन विजय' शुरू किया। कैप्टन बत्रा ने इस युद्ध में अपना शौर्य दिखाया। सबसे पहले उन्हें प्वाइंट 5140 पर कब्जा करने की जिम्मेदारी दी गई। यह दुश्मनों की एक मजबूत चौकी थी, जिस पर जीत हासिल करना बहुत मुश्किल माना जा रहा था। लेकिन कैप्टन बत्रा ने अपने साथियों से कहा था, "या तो तिरंगा लहराकर आऊंगा या तिरंगे में लिपटकर… लेकिन आऊंगा जरूर।" दुश्मनों की मशीन गन की गोलियों की बौछार के बीच, उन्होंने अपने सैनिकों के साथ खड़ी चट्टान पर चढ़ाई की। ग्रेनेड फेंककर दुश्मनों की चौकी को तबाह कर दिया और हाथ से हाथ की लड़ाई में तीन पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया। इस दौरान वे घायल भी हुए, लेकिन मिशन पूरा होने तक मोर्चे पर डटे रहे। 20 जून 1999 की तड़के, 17 हजार फीट की ऊंचाई पर जब प्वाइंट 5140 फतह हुआ, तो रेडियो पर उनकी आवाज गूंजी, "ये दिल मांगे मोर!" यह नारा सिर्फ एक विज्ञापन का नारा नहीं रहा, बल्कि पूरे देश का जज्बा बन गया।

इसके बाद कैप्टन बत्रा और उनकी बटालियन ने प्वाइंट 5100, 4700, जंक्शन पीक और 'थ्री पिम्पल्स' जैसे मुश्किल मोर्चों पर भी जीत हासिल की। उनकी बहादुरी का खौफ पाकिस्तानी सेना में फैल चुका था, इसीलिए दुश्मन भी उन्हें 'शेरशाह' कहते थे। 6 जुलाई 1999 को उन्हें प्वाइंट 4875 पर कब्जा करने का आदेश मिला। यह जगह आज 'बत्रा टॉप' के नाम से जानी जाती है। सुबह होते-होते उन्होंने मोर्चा संभाल लिया। तभी उनके एक साथी अधिकारी कैप्टन नवीन नागप्पा गंभीर रूप से घायल हो गए। कैप्टन बत्रा ने उन्हें खुद सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया। जब एक जवान को गोली लगी, तो उसे बचाने के लिए कैप्टन बत्रा दुश्मन की गोलियों की बौछार में कूद पड़े। इसी दौरान एक स्नाइपर की गोली उनके सीने में लगी। अपनी आखिरी सांस लेते हुए उन्होंने अपने रेजिमेंट का जयकारा लगाया - 'जय माता दी।' 7 जुलाई 1999 को देश ने अपने इस वीर सपूत को खो दिया, लेकिन उनके बलिदान ने प्वाइंट 4875 पर तिरंगा लहरा दिया। कैप्टन विक्रम बत्रा की वीरता और नेतृत्व की मिसाल को देखते हुए, उन्हें मरणोपरांत 15 अगस्त 1999 को भारत का सर्वोच्च वीरता सम्मान 'परमवीर चक्र' प्रदान किया गया।